माया की भ्रामक ऊर्जा के राज्य में पारिवारिक जीवन शाश्वत जीव के लिए एक जेल के समान है। जेल में एक कैदी को लोहे की जंजीरों और लोहे की सलाखों से जकड़ा जाता है। इसी तरह, एक सशर्त आत्मा एक महिला के आकर्षक सौंदर्य, उसके एकाकी आलिंगन और तथाकथित प्रेम की बातों और अपने छोटे बच्चों के मीठे शब्दों से जकड़ी होती है। इस प्रकार वह अपनी वास्तविक पहचान भूल जाती है।
इस श्लोक में शब्द त्रिणां असतीनाम दर्शाते हैं कि स्त्री प्रेम केवल मनुष्य के मन को उत्तेजित करने के लिए है। वास्तव में, भौतिक संसार में कोई प्रेम नहीं है। स्त्री और पुरुष दोनों ही अपनी इंद्रिय तृप्ति में रुचि रखते हैं। इंद्रिय तृप्ति के लिए एक महिला एक भ्रामक प्रेम का निर्माण करती है, और पुरुष इस तरह के झूठे प्रेम से मंत्रमुग्ध हो जाता है और अपने वास्तविक कर्तव्य को भूल जाता है। जब ऐसे संयोजन के परिणामस्वरूप बच्चे होते हैं, तो अगला आकर्षण बच्चों के मीठे शब्दों का होता है। घर पर स्त्री का प्यार और बच्चों की बातें किसी को एक सुरक्षित कैदी बना देती हैं, और इस तरह वह अपने घर को नहीं छोड़ सकता। ऐसे व्यक्ति को वैदिक भाषा में गृहमेधी कहा जाता है, जिसका अर्थ है "जिसका आकर्षण का केंद्र घर है।" गृहस्थ उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो परिवार, पत्नी और बच्चों के साथ रहता है, लेकिन उसका जीवन का वास्तविक उद्देश्य कृष्ण भावना विकसित करना है। इसलिए व्यक्ति को गृहस्थ बनने की सलाह दी जाती है, न कि गृहमेधी। गृहस्थ की चिंता भ्रम से निर्मित पारिवारिक जीवन से बाहर निकलने और कृष्ण के साथ वास्तविक पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की है, जबकि गृहमेधी का व्यवसाय खुद को तथाकथित पारिवारिक जीवन में बार-बार जंजीर से जोड़ना है, एक के बाद एक जीवन में और माया के अंधेरे में सदा बना रहना है।
