श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.30.6 
आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।
निरूढमूलहृदय आत्मानं बहु मन्यते ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर, पत्नी, घर, बच्चों, जानवरों, संपत्ति और दोस्तों के प्रति गहरे आकर्षण के कारण व्यक्ति को अपने जीवनयापन के प्रति इस प्रकार का संतोष मिलता है। ऐसी संगति में बद्ध आत्मा खुद को पूरी तरह से सही मानती है।
 
This kind of satisfaction with one's standard of living is due to one's intense attraction towards one's body, wife, house, children, animals, property and friends. In such association the conditioned soul considers himself to be completely right.
तात्पर्य
ह्यूमन लाइफ़ का ये तथाकथित परफ़ेक्शन एक आविष्कार है। इसलिए, यह कहा गया है कि मेटेरियलिस्ट, भले ही वो किसी भी हद तक भौतिक रूप से सक्षम क्यों न हो, मूल्यहीन है क्योंकि वो मानसिक प्लेन पर होवर कर रहा है, जो उसे फिर से अस्थाई लाइफ़ के भौतिक अस्तित्व की ओर खींच ले जाएगा। जो कोई भी मानसिक प्लेन पर एक्ट करता है वो आध्यात्मिक रूप से प्रमोशन नहीं पा सकता। ऐसे व्यक्ति का भौतिक लाइफ़ में फिर से वापिस घिसटना निश्चित है। तथाकथित सोसायटी, दोस्ती और प्यार के एसोसिएशन में, शर्तों से बंधी हुई आत्मा पूरी तरह संतुष्ट दिखती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)