श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.30.5 
नरकस्थोऽपि देहं वै न पुमांस्त्यक्तुमिच्छति ।
नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहित: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी प्रकृति में जीव अपनी योनि में ही सन्तुष्ट रहता है, जबकि माया की आवरणात्मक शक्ति में फंसकर उसे अपने शरीर को छोड़ना प्रिय नहीं होता है, यहाँ तक कि वह नरक में भी रहता है, क्योंकि उसे नारकीय भोग में ही आनन्द मिलता है।
 
The conditioned soul is satisfied with his particular species; bewildered by the covering influence of Maya, he does not wish to give up his body, even if it is in hell, because he finds pleasure in hellish enjoyment.
तात्पर्य
कहा जाता है कि एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र को उनके आध्यात्मिक गुरु बृहस्पति ने उनके दुर्व्यवहार के कारण शाप दिया था, और वह इस ग्रह पर एक सुअर बन गए थे। कई दिनों के बाद, जब ब्रह्मा उन्हें अपने स्वर्गीय साम्राज्य में वापस बुलाना चाहते थे, इंद्र, एक सुअर के रूप में, स्वर्गीय राज्य में अपने शाही पद का सब कुछ भूल गए और उन्होंने वापस जाने से इनकार कर दिया। यह माया का जादू है। इंद्र भी अपने स्वर्गीय जीवन स्तर को भूल जाते हैं और सुअर के जीवन के स्तर से संतुष्ट हो जाते हैं। माया के प्रभाव से वातानुकूलित आत्मा अपनी विशेष प्रकार की देह के प्रति इतनी आसक्त हो जाती है कि यदि उसे यह प्रस्ताव दिया जाता है, "इस शरीर को त्याग दो, और तुरंत तुम्हें राजा का शरीर मिलेगा" तो वह सहमत नहीं होगा। यह लगाव सभी वातानुकूलित जीवित प्राणियों को दृढ़ता से प्रभावित करता है। भगवान कृष्ण व्यक्तिगत रूप से आग्रह करते हैं, "इस भौतिक जगत में सब कुछ छोड़ दो। मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें सभी सुरक्षा दूंगा," लेकिन हम सहमत नहीं हैं। हम सोचते हैं, "हम बिल्कुल ठीक हैं। हमें कृष्ण के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए और उनके राज्य में वापस क्यों जाना चाहिए?" इसे भ्रम या माया कहा जाता है। हर कोई अपने जीवन स्तर से संतुष्ट होता है, चाहे वह कितना भी घृणित क्यों न हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)