श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.30.33 
केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुक: ।
याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमस: पदम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए जो व्यक्ति अपने परिवार और सगे-संबंधियों का पालन करने के लिए सिर्फ गलत तरीकों का सहारा लेता है, वह निश्चित रूप से अंधतामिस्र नामक गहनतम नरक में जाता है।
 
Therefore, the person who is eager to support his family and relatives only through evil means, definitely goes to the deepest hell called Andhatamisra.
तात्पर्य
इस श्लोक में तीन शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। केवलेन का अर्थ है "केवल काले तरीकों से", अधर्मणा का अर्थ है "अधर्मी" या "अधार्मिक", और कुटुंब-भारण का अर्थ है "परिवार का पालन-पोषण"। निश्चित रूप से अपने परिवार का भरण-पोषण करना एक गृहस्थ का कर्तव्य है, लेकिन व्यक्ति को शास्त्रों में बताए अनुसार निर्धारित तरीके से अपनी आजीविका कमाने के लिए उत्सुक होना चाहिए। भगवद्-गीता में यह वर्णन किया गया है कि भगवान ने सामाजिक व्यवस्था को गुण और कार्य के अनुसार चार वर्णों या जातियों में विभाजित किया है। भगवद्-गीता के अलावा, प्रत्येक समाज में एक व्यक्ति को उसके गुण और कार्य के अनुसार जाना जाता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति लकड़ी का फर्नीचर बना रहा होता है, तो उसे बढ़ई कहा जाता है, और एक व्यक्ति जो एनविल और लोहे के साथ काम करता है उसे लोहार कहा जाता है। इसी तरह, एक व्यक्ति जो चिकित्सा या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में लगा हुआ है उसकी एक विशेष जिम्मेदारी और पदनाम होता है। ये सभी मानवीय गतिविधियाँ सर्वोच्च भगवान द्वारा चार वर्णों, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित की गई हैं। भगवद्-गीता और अन्य वैदिक साहित्यों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के विशिष्ट कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। व्यक्ति को अपनी योग्यता के अनुसार ईमानदारी से काम करना चाहिए। उसे अपनी आजीविका अनुचित तरीके से नहीं कमानी चाहिए, जिसके लिए वह योग्य नहीं है। यदि एक ब्राह्मण जो एक पुजारी के रूप में काम करता है ताकि वह अपने अनुयायियों को जीवन के आध्यात्मिक तरीके से अवगत करा सके, वह एक पुजारी के रूप में योग्य नहीं है, तो वह जनता को धोखा दे रहा है। ऐसे अनुचित साधनों से कमाई नहीं करनी चाहिए। यही बात एक क्षत्रिय या वैश्य पर भी लागू होती है। यह विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि जो लोग कृष्ण चेतना में उन्नति करने की कोशिश कर रहे हैं उनकी आजीविका के साधन बहुत ही निष्पक्ष और सरल होने चाहिए। यहाँ यह उल्लेख किया गया है कि जो व्यक्ति अनुचित साधनों (केवलन) से अपनी आजीविका कमाता है, उसे सबसे अंधेरे नारकीय क्षेत्र में भेजा जाता है। अन्यथा, यदि कोई निर्धारित तरीकों और ईमानदार साधनों से अपने परिवार का भरण-पोषण करता है, तो किसी के परिवार वाला होने पर कोई आपत्ति नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)