इस दुनिया में भी, यदि कोई व्यक्ति किसी की हत्या करके कुछ धन प्राप्त करता है, तो परिवार को फाँसी नहीं दी जाती है, हालाँकि इसके सदस्य पाप से दूषित होते हैं। परन्तु वह व्यक्ति जो हत्या करता है और अपने परिवार का भरण-पोषण करता है, उसे स्वयं हत्यारे के रूप में फाँसी दी जाती है। अप्रत्यक्ष उपभोक्ता की तुलना में प्रत्यक्ष अपराधी पापपूर्ण गतिविधियों के लिए अधिक जिम्मेदार होता है। महान विद्वान चाणक्य पंडित इसलिए कहते हैं कि जो कुछ भी किसी के पास है, वह सत के कारण के लिए व्यय करना ही बेहतर है, या परम व्यक्तित्व भगवान के लिए, क्योंकि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति अपने साथ नहीं ले जा सकता है। वे यहीं रह जाते हैं और वे नष्ट हो जाएंगे। या तो हम धन छोड़ते हैं या धन हमें छोड़ देता है, परन्तु हम अलग हो जाएंगे। जब तक धन हमारे कब्जे में है, उसका सबसे अच्छा उपयोग कृष्ण चेतना प्राप्त करने के लिए इसे व्यय करना है।
