श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.30.21 
तयोर्निर्भिन्नहृदयस्तर्जनैर्जातवेपथु: ।
पथि श्वभिर्भक्ष्यमाण आर्तोऽघं स्वमनुस्मरन् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
यमदूतों द्वारा ले जाते समय उसे दबाया-कुचला जाता है और उनके हाथों में वह काँपता रहता है। रास्ते में चलते समय कुत्ते उसे काटते हैं और उसे अपने जीवन के पापों का स्मरण होता है। इस प्रकार वह अत्यधिक पीड़ा में रहता है।
 
Thus, while being taken away by Yamraj's soldiers, he is pressed and crushed and he keeps trembling in their hands. On the way, he is bitten by dogs and he remembers the sins of his life. Thus, he remains extremely sad.
तात्पर्य
इस श्लोक से प्रतीत होता है कि इस लोक से यमराज के लोक जाते समय, यमराज के सिपाहियों के द्वारा गिरफ्तार किए गए अपराधी को कई कुत्ते मिलते हैं, जो उसके द्वारा भोग-विलास में किए गए अपराधों की याद दिलाते हुए उस पर भौंकते हैं और उसे काटते हैं। भगवद्-गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति भोग-विलास की इच्छा से क्रोधित होता है, वह लगभग अँधा हो जाता है और ज्ञानशून्य हो जाता है। वह सब कुछ भूल जाता है। कामै स्तै स्तै हृत-ज्ञान: अर्थात जब कोई व्यक्ति भोग-विलास में बहुत अधिक आसक्त हो जाता है, तो यह उसकी बुद्धि को नष्ट कर देता है और वह यह भूल जाता है कि उसे उसके परिणाम भी भुगतने होंगे। यमराज के द्वारा नियुक्त कुत्तों द्वारा उसे भोग-विलास की गतिविधियों को याद दिलाने का अवसर दिया जाता है। जब हम स्थूल शरीर में रहते हैं, तो आधुनिक सरकारी नियमों द्वारा भी इस प्रकार के भोग-विलास को प्रोत्साहन दिया जाता है। दुनिया भर के हर राज्य में, सरकार द्वारा गर्भनिरोध के रूप में ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाता है। महिलाओं को गोलियाँ (गर्भनिरोधक) दी जाती हैं, और गर्भपात के लिए सहायता प्राप्त करने के लिए उन्हें नैदानिक प्रयोगशाला में जाने की अनुमति दी जाती है। यह सब भोग-विलास के परिणामस्वरूप हो रहा है। वास्तव में यौन जीवन एक अच्छे बच्चे को जन्म देने के लिए है, लेकिन क्योंकि लोगों का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं है और उन्हें इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए प्रशिक्षित करने वाली कोई संस्था नहीं है, तो बेचारे लोग भोग-विलास के आपराधिक अपराधों के शिकार हो जाते हैं, और मृत्यु के बाद उन्हें श्रीमद्- भागवतम के इन पृष्ठों में वर्णित अनुसार दंड दिया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)