श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.30.2 
यं यमर्थमुपादत्ते दु:खेन सुखहेतवे ।
तं तं धुनोति भगवान्पुमाञ्छोचति यत्कृते ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
तथाकथित सुखों हेतु भौतिकवादी अत्यधिक परिश्रम सहित अनेक वस्तुओं का अर्जन करता है, परन्तु कालरूप में परमपुरुष उन सबको नष्ट कर देता है और इसके कारण बँधा हुआ जीव उन वस्तुओं के विनष्ट हो जाने पर शोक करता है।
 
All the things which are acquired by a materialist with great difficulty and hard work for the so-called happiness, are destroyed by the Supreme Being in the form of time and because of this the conditioned soul laments for them.
तात्पर्य
सर्वोच्च ईश्वर-भागवद-व्यक्तित्व के यथार्थ प्रतिनिधि काल-तत्व का मुख्य काम है हर चीज का विनाश करना। भौतिकवादी भौतिक चेतना में आर्थिक विकास के नाम पर बहुत-सी चीजों का उत्पादन करने में तल्लीन हैं। वे सोचते हैं कि मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में आगे बढ़ कर वे सुखी होंगे, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि हर वो चीज जिसका उन्होंने उत्पादन किया है, समय के साथ नष्ट हो जाएगी। इतिहास से हम देख सकते हैं कि दुनिया के चक्र में कई शक्तिशाली साम्राज्य थे, जो महान कष्ट और महान दृढ़ता के साथ बनाए गए थे, लेकिन समय के साथ वे सभी नष्ट हो गए हैं। फ़िर भी, मूर्ख भौतिकवादी नहीं समझ पा रहे हैं कि वे बस समय के साथ नष्ट होने वाले भौतिक आवश्यकताओं के उत्पादन में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। ऊर्जा की यह बर्बादी लोगों के समुदाय की अज्ञानता के कारण है, जो नहीं जानते कि वे अविनाशी हैं और उनकी भी एक अविनाशी नियुक्ति है। वे नहीं जानते कि शरीर के किसी विशेष प्रकार में जीवन का यह अंतराल नित्य यात्रा की एक झलक मात्र है। इस तथ्य को न जानने के कारण वे जीवन की छोटी-सी झलक को ही सब कुछ मानते हैं, और वे आर्थिक स्थितियों में सुधार करने में समय बर्बाद करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)