श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.30.19 
यमदूतौ तदा प्राप्तौ भीमौ सरभसेक्षणौ ।
स दृष्ट्वा त्रस्तहृदय: शकृन्मूत्रं विमुञ्चति ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु के समय वह देखता है कि यमराज के दूत उसके सामने आते हैं जिनके नेत्र क्रोध से भरे होते हैं। इस प्रकार भय के मारे उसका मल-मूत्र निकल जाता है।
 
At the time of death, he sees Yamraj's messengers coming in front of him, whose eyes are filled with anger. In this way, out of fear, he stops passing urine and stool.
तात्पर्य
वर्तमान शरीर को छोड़ने के बाद जीव के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं। एक प्रकार का संक्रमण अधर्म कर्मों के नियंत्रक के पास जाना है, जो यमराज के नाम से जाना जाता है, और दूसरा उच्च ग्रहों पर जहाँ वैकुण्ठ तक जाना है। यहाँ भगवान कपिल वर्णन करते हैं कि इन्द्रियों के संतुष्टि की गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति को परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कैसे यमराज के दूतों, जिन्हें यमदूत कहा जाता है, द्वारा व्यवहार किया जाता है। मृत्यु के समय यमदूत उन व्यक्तियों के संरक्षक बन जाते हैं जिन्होंने दृढ़ता से अपने इंद्रियों को संतुष्ट किया है। वे मरने वाले व्यक्ति को अपने कब्ज़े में लेते हैं और उसे उस ग्रह पर ले जाते हैं जहां यमराज निवास करते हैं। वहां की दशाओं का वर्णन निम्नलिखित छंदों में किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)