आस्तेऽवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन् ।
आमयाव्यप्रदीप्ताग्निरल्पाहारोऽल्पचेष्टित: ॥ १५ ॥
अनुवाद
वह घर पर पालतू कुत्ते की तरह रहता है और लापरवाही से उसे जो कुछ भी दिया जाता है, उसे खाता है। अजीर्ण और मंदाग्नि जैसी कई बीमारियों से ग्रस्त होकर, वह केवल कुछ कौर भोजन करता है और कमजोर होने के कारण कोई भी काम करने में असमर्थ हो जाता है।
He lives like a pet dog at home and eats whatever is given to him with disdain. Suffering from various ailments like indigestion and poor digestion, he eats only a few mouthfuls of food and is unable to do any work due to weakness.
तात्पर्य
मृत्यु से मुलाकात से पहले व्यक्ति निश्चित रूप से बीमार और विकलांग हो जाता है, और जब उसके परिवार के सदस्य उसकी उपेक्षा करते हैं, तो उसका जीवन कुत्ते से भी कम हो जाता है क्योंकि उसे इतनी दयनीय परिस्थितियों में रखा जाता है। इसलिए वैदिक साहित्य का कहना है कि ऐसी दयनीय परिस्थितियों के आने से पहले व्यक्ति को घर छोड़ देना चाहिए और अपने परिवार के सदस्यों की जानकारी के बिना मर जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति घर छोड़ देता है और अपने परिवार को बिना बताए मर जाता है, तो उसे एक गौरवपूर्ण मृत्यु माना जाता है। लेकिन एक आसक्त परिवार वाला व्यक्ति चाहता है कि उसकी मृत्यु के बाद भी उसके परिवार के सदस्य उसे एक बड़े जुलूस में ले जाएँ, और हालाँकि वह यह नहीं देख पाएगा कि जुलूस कैसे जाता है फिर भी वह चाहता है कि उसके शरीर को भव्य जुलूस में ले जाया जाए। इस तरह वह यह जाने बिना खुश रहता है कि जब वह अपने शरीर को अगले जन्म के लिए छोड़ता है तो उसे कहाँ जाना है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥