वह हिंसा करके इधर-उधर से धन प्राप्त करता है और यद्यपि वह इसे अपने परिवार के भरण-पोषण में लगाता है, स्वयं उस प्रकार के खरीदे भोजन का अल्पांश ही ग्रहण करता है। इस तरह वह उन लोगों के लिए नरक जाता है जिनके लिए उसने अनियमित तरीके से धन कमाया।
He acquires wealth by violence here and there and though he uses it for the maintenance of his family, he himself takes only a small portion of the food thus purchased. Thus he goes to hell for those for whom he earned money by illegal means.
तात्पर्य
एक बंगाली कहावत है, "जिस व्यक्ति के लिए मैंने चोरी की, वह मुझे चोर कहता है।" परिवार के सदस्य, जिनके लिए एक आसक्त व्यक्ति इतने सारे आपराधिक तरीकों से कार्य करता है, कभी संतुष्ट नहीं होते। भ्रम में एक आसक्त व्यक्ति ऐसे परिवार के सदस्यों की सेवा करता है, और उनकी सेवा करके वह जीवन की नारकीय स्थिति में प्रवेश करने के लिए नियत होता है। उदाहरण के लिए, एक चोर अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए चोरी करता है, और उसे पकड़कर जेल में डाल दिया जाता है। यह भौतिक अस्तित्व और भौतिक समाज, दोस्ती और प्रेम के लगाव का सारांश और पदार्थ है। यद्यपि एक आसक्त परिवार का व्यक्ति अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हमेशा धन प्राप्त करने में लगा रहता है, परंतु वह उससे अधिक प्राप्त नहीं कर सकता जो वह ऐसी आपराधिक गतिविधियों के बिना भी उपभोग कर लेता है। एक व्यक्ति जो आठ औंस खाद्य पदार्थ खाता है उसे एक बड़े परिवार का भरण-पोषण करना पड़ सकता है और उस परिवार का पालन-पोषण करने के लिए किसी भी तरह से पैसा कमाना पड़ सकता है, परंतु उसे खुद उतना ही भोजन दिया जाता है जितना वह खा सकता है, और कभी-कभी वह अपने परिवार के सदस्यों को खिलाने के बाद बचे हुए अवशेष ही खाता है। अनुचित तरीकों से पैसा कमाने के बाद भी, वह स्वयं के लिए जीवन का आनंद नहीं ले सकता। इसे माया का आवरण भ्रम कहा जाता है। समाज, देश और समुदाय की भ्रामक सेवा की प्रक्रिया हर जगह एक ही है; यही सिद्धांत बड़े राष्ट्रीय नेताओं पर भी लागू होता है। एक राष्ट्रीय नेता जो अपने देश की सेवा करने में बहुत महान होता है, अनियमित सेवा के कारण कभी-कभी अपने देशवासियों द्वारा मार दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, कोई इस भ्रामक सेवा द्वारा अपने आश्रितों को संतुष्ट नहीं कर सकता, यद्यपि कोई सेवा से बाहर नहीं निकल सकता क्योंकि सेवक उसकी संवैधानिक स्थिति है। एक जीवित इकाई संवैधानिक रूप से सर्वोच्च व्यक्ति का अभिन्न अंग है, परंतु वह भूल जाता है कि उसे सर्वोच्च व्यक्ति की सेवा करनी है और अपना ध्यान दूसरों की सेवा में लगा देता है; इसे माया कहा जाता है। दूसरों की सेवा करके वह झूठे तरीके से सोचता है कि वह स्वामी है। परिवार का मुखिया अपने आप को परिवार का स्वामी समझता है, या राष्ट्र का नेता अपने आप को राष्ट्र का स्वामी समझता है, जबकि वास्तव में वह सेवा कर रहा है, और माया की सेवा करके वह धीरे-धीरे नरक की ओर जा रहा है। इसलिए, एक समझदार व्यक्ति को कृष्ण चेतना के बिंदु पर आना चाहिए और पूरे जीवन, अपनी सारी संपत्ति, अपनी संपूर्ण बुद्धि और बोलने की अपनी पूरी शक्ति को लागू करते हुए सर्वोच्च प्रभु की सेवा में लगाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥