श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.29.39 
न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धव: ।
आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान को किसी से कोई प्रेम नहीं है, न ही उनका कोई दुश्मन या मित्र है। लेकिन वे उन्हीं लोगों को प्रेरणा देते हैं जो उन्हें नहीं भूले हैं और जो उन्हें भूल चुके हैं उनका नाश कर देते हैं।
 
भगवान को किसी से कोई प्रेम नहीं है, न ही उनका कोई दुश्मन या मित्र है। लेकिन वे उन्हीं लोगों को प्रेरणा देते हैं जो उन्हें नहीं भूले हैं और जो उन्हें भूल चुके हैं उनका नाश कर देते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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