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श्लोक 3.29.33  |
तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तर: ।
मय्यर्पितात्मन: पुंसो मयि संन्यस्तकर्मण: ।
न पश्यामि परं भूतमकर्तु: समदर्शनात् ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसलिए मुझे उस व्यक्ति से बड़ा कोई नहीं लगता जो मुझसे भिन्न किसी भी रुचि में नहीं लगता और इसीलिए लगातार अपने सारे कर्म और अपना पूरा जीवन—सब कुछ मुझे अर्पित करता है। |
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| इसलिए मुझे उस व्यक्ति से बड़ा कोई नहीं लगता जो मुझसे भिन्न किसी भी रुचि में नहीं लगता और इसीलिए लगातार अपने सारे कर्म और अपना पूरा जीवन—सब कुछ मुझे अर्पित करता है। |
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