श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.29.32 
अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता तत: श्रेयान्स्वकर्मकृत् ।
मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मन: ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
वेदों के तत्व-ज्ञान को जानने वाले ब्राह्मण से भी विद्वान वह मनुष्य है जो संशयों का निवारण कर सके। उससे भी श्रेष्ठ है वह जो ब्राह्मण नियमों का पालन दृढ़तापूर्वक करता है। उससे भी श्रेष्ठ वह है जो भौतिक प्रकृति के जाल से मुक्त है। उससे भी श्रेष्ठ वह है जो भक्तिभाव से निःस्वार्थ भाव से ईश्वर की सेवा करता है।
 
वेदों के तत्व-ज्ञान को जानने वाले ब्राह्मण से भी विद्वान वह मनुष्य है जो संशयों का निवारण कर सके। उससे भी श्रेष्ठ है वह जो ब्राह्मण नियमों का पालन दृढ़तापूर्वक करता है। उससे भी श्रेष्ठ वह है जो भौतिक प्रकृति के जाल से मुक्त है। उससे भी श्रेष्ठ वह है जो भक्तिभाव से निःस्वार्थ भाव से ईश्वर की सेवा करता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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