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श्लोक 3.29.25  |
अर्चादावर्चयेत्तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।
यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| मनुष्य को अपने धर्म और कर्मों के अनुसार ईश्वर के श्री विग्रह की आराधना तब तक करनी चाहिए, जब तक की उसे स्वयं के हृदय और दूसरे जीवों के हृदय में भी मेरी उपस्थिति का एहसास न हो जाए। |
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| मनुष्य को अपने धर्म और कर्मों के अनुसार ईश्वर के श्री विग्रह की आराधना तब तक करनी चाहिए, जब तक की उसे स्वयं के हृदय और दूसरे जीवों के हृदय में भी मेरी उपस्थिति का एहसास न हो जाए। |
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