श्वास के मार्ग को साफ करने के लिए, तीन अलग-अलग गतिविधियाँ सुझाई गई है: पूरक, कुम्भक और रेचक। श्वास खींचना पूरक कहा जाता है, उसे अंदर रखना कुम्भक कहा जाता है, और इसे अंदर से बाहर निकालना रेचक कहा जाता है। इन सुझाई गई प्रक्रियाओं को विपरीत क्रम में भी किया जा सकता है। श्वास छोड़ने के बाद, कोई कुछ देर के लिए अपने फेफड़ों से हवा को बाहर रख सकता है और फिर अंदर खींच सकता है। नसें, जिनके द्वारा श्वास अंदर ली और बाहर निकाली जाती है, तकनीकी रूप से इड़ा और पिंगला कहलाती है। इड़ा और पिंगला मार्ग को साफ करने का मुख्य उद्देश्य, मन को भौतिकता के आनंद से दूर करना है। जैसा कि भगवद-गीता में उल्लेख किया गया है, उसका मन उसका शत्रु है, और उसका मन उसकी मित्र भी है; इसकी स्थिति, जीवित प्राणी के विभिन्न व्यवहारों के अनुसार बदलती रहती है। अगर हम अपने मन को भौतिक आनंद के ख्यालों की ओर मोड़ते है, तो हमारा मन शत्रु बन जाता है, और अगर हम अपने मन को श्री कृष्ण के चरण कमलों पर केन्द्रित करते है, तो हमारा मन एक मित्र है। पूरक, कुम्भक और रेचक के योग प्रणाली द्वारा या सीधे मन को कृष्ण के ध्वनि कम्पन या कृष्ण के रूप पर स्थिर करके, एक ही उद्देश्य हासिल किया जाता है। भगवद-गीता में कहा गया है कि किसी को श्वास अभ्यास (अभ्यास-योग-युक्तेन) का अभ्यास करना चाहिए। नियंत्रण की इस प्रक्रिया के गुण के द्वारा, मन बाहरी विचारों (चेतसा नाना-गाना) की ओर नहीं भटक सकता है। इस तरह कोई अपने मन को लगातार परमेश्वर श्री कृष्ण पर स्थिर कर सकता है और उसे प्राप्त कर सकता है (याति)।
इस युग में, अभ्यास और श्वास नियंत्रण की योग प्रणाली का पालन करना, किसी व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है, और इसलिए भगवान चैतन्य ने सिफारिश की, कीर्तनीयः सदा हरिः : किसी को हमेशा परमेश्वर श्री कृष्ण के पवित्र नाम का जप करना चाहिए, क्योंकि कृष्ण, परमेश्वर श्री कृष्ण का सबसे उपयुक्त नाम है। कृष्ण नाम और परमेश्वर कृष्ण, अलग नहीं है। इसलिए, अगर कोई अपने मन को हरि कृष्ण को सुनने और जपने पर केन्द्रित करता है, तो वही परिणाम हासिल होता है।
