श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.28.6 
स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।
वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथात्मन: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर के भीतर के छह चक्रों में से किसी एक पर प्राण और मन को स्थिर करना और इस प्रकार अपने मन को परमपुरुष भगवान् की दिव्य लीलाओं में केन्द्रित करना, मन की समाधि या समाहित अवस्था कहलाती है।
 
Fixing the life force and mind in any one of the six chakras within the body and thus concentrating the mind on the divine activities of the Lord is called Samadhi or settlement of the mind.
तात्पर्य
शरीर के अंदर प्राणवायु (vital air) के संचारण के छह चक्र होते हैं। पहला चक्र पेट के भीतर है, दूसरा चक्र हृदय के क्षेत्र में है, तीसरा फेफड़ों के क्षेत्र में है, चौथा तालू पर है, पांचवां भौंहों के बीच है और सबसे ऊपर, छठा चक्र मस्तिष्क के ऊपर है। व्यक्ति को अपने मन और प्राण वायु के संचरण को स्थिर रखना होगा और इस प्रकार परमेश्वर के पारलौकिक लीलाओं के बारे में सोचना होगा। यह कभी नहीं कहा गया है कि किसी को अवैयक्तिक या शून्य पर ध्यान देना चाहिए। यह स्पष्ट रूप से कहा गया है, वैकुण्ठ-लीला। लीला का अर्थ है "लीलाएँ"। जब तक परम सत्य, भगवान के व्यक्तित्व, में पारलौकिक गतिविधियाँ नहीं होती हैं, तब तक इन लीलाओं के बारे में सोचने का अवसर कहाँ है? भक्ति सेवा की प्रक्रियाओं, परमेश्वर के व्यक्तितत्व के लीलाओं का जप और श्रवण के माध्यम से, व्यक्ति इस एकाग्रता को प्राप्त कर सकता है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम में वर्णित है, भगवान विभिन्न भक्तों के साथ अपने संबंधों के अनुसार प्रकट और प्रत्याहृत होते हैं। वैदिक साहित्य में भगवान के लीलाओं के कई वर्णन हैं, जिनमें कुरुक्षेत्र की लड़ाई और प्रह्लाद महाराज, ध्रुव महाराज और अंबरीष महाराज जैसे भक्तों के जीवन और उपदेशों से संबंधित ऐतिहासिक तथ्य शामिल हैं। व्यक्ति को केवल अपने मन को ऐसे ही एक कथन पर केंद्रित करने और उसके विचार में हमेशा तल्लीन रहने की आवश्यकता होती है। तब वह समाधि में होगा। समाधि कोई कृत्रिम शारीरिक अवस्था नहीं है; यह वह अवस्था होती है जब मन भगवान के व्यक्तित्व के विचारों में वास्तव में तल्लीन हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)