ब्रह्म साक्षात्कार के बाद, व्यक्ति ब्रह्म की गतिविधियों में संलग्न हो सकता है। जब तक व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार नहीं करता है, तब तक वह शरीर के साथ झूठी पहचान के आधार पर गतिविधियों में संलग्न रहता है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्व में स्थित होता है, तब ब्रह्म साक्षात्कार की गतिविधियाँ शुरू होती हैं। मायावादी दार्शनिकों का कहना है कि ब्रह्म साक्षात्कार के बाद, सभी गतिविधियाँ रुक जाती हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि आत्मा अपनी असामान्य स्थिति में इतनी सक्रिय है, पदार्थ के आवरण के तहत विद्यमान है, तो मुक्त होने पर कोई अपनी गतिविधि को कैसे नकार सकता है? यहाँ एक उदाहरण दिया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति रोगग्रस्त अवस्था में बहुत सक्रिय है, तो कोई कैसे कल्पना कर सकता है कि जब वह रोग से मुक्त हो जाएगा तो वह निष्क्रिय हो जाएगा? स्वाभाविक रूप से निष्कर्ष यह है कि जब व्यक्ति सभी रोगों से मुक्त हो जाता है तो उसकी गतिविधियाँ शुद्ध होती हैं। यह कहा जा सकता है कि ब्रह्म साक्षात्कार की गतिविधियाँ सशर्त जीवन की गतिविधियों से भिन्न होती हैं, लेकिन इससे गतिविधि नहीं रुकती है। यह भगवद-गीता (18.54) में इंगित किया गया है: जब कोई खुद को ब्रह्म के रूप में महसूस करता है, तो भक्ति सेवा शुरू होती है। मद्-भक्तिं लभते पराम: ब्रह्म साक्षात्कार के बाद, व्यक्ति भगवान की भक्ति सेवा में संलग्न हो सकता है। इसलिए भगवान की भक्ति सेवा ब्रह्म साक्षात्कार में गतिविधि है।
जो लोग भक्ति सेवा में संलग्न होते हैं, उनके लिए माया का कोई आच्छादन नहीं होता है, और उनकी स्थिति सर्व-पूर्ण होती है। जीव का कर्तव्य, समग्र के भाग और पार्सल के रूप में, समग्र की भक्ति सेवा प्रदान करना है। यही जीवन की परम पूर्णता है।
