जैसा कि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, न केवल परम आत्मा प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करती है, बल्कि वह परमाणुओं में भी प्रवेश करती है। परम आत्मा हर जगह निष्क्रिय अवस्था में मौजूद है, और जब कोई सर्वत्र परम आत्मा की उपस्थिति देख सकता है, तो वह भौतिक पदनामों से मुक्त हो जाता है।
'सर्व-भूतेषु' शब्द को इस प्रकार समझा जाना चाहिए। प्रजातियों के चार अलग-अलग विभाग हैं: पृथ्वी से अंकुरित होने वाले जीवित संस्थाएं, किण्वन या अंकुरण से जन्मे जीवित संस्थाएं, जो अंडों से आती हैं और भ्रूण से आने वाली जीवित संस्थाएं। जीवित संस्थाओं के इन चार विभागों को 8,400,000 जीवन प्रजातियों में विस्तारित किया गया है। एक व्यक्ति जो भौतिक पदनामों से मुक्त हो गया है, वह हर जगह या हर प्रकट जीवित इकाई में आत्मा के समान गुण देख सकता है। कम बुद्धिमान लोग सोचते हैं कि पौधे और घास स्वचालित रूप से पृथ्वी से उगते हैं, लेकिन जो वास्तव में बुद्धिमान है और आत्म को महसूस कर चुका है, वह देख सकता है कि यह विकास स्वचालित नहीं है; कारण आत्मा है, और रूप विभिन्न परिस्थितियों में भौतिक शरीरों में निकलते हैं। प्रयोगशाला में किण्वन द्वारा कई रोगाणु पैदा होते हैं, लेकिन यह आत्मा की उपस्थिति के कारण होता है। भौतिक वैज्ञानिक सोचते हैं कि अंडे निर्जीव होते हैं, लेकिन यह सच नहीं है। वैदिक ग्रंथ से हम समझ सकते हैं कि विभिन्न रूपों में जीवित संस्थाएँ विभिन्न परिस्थितियों में उत्पन्न होती हैं। पक्षी अंडों से विकसित होते हैं, और जानवर और मनुष्य भ्रूण से पैदा होते हैं। योगी या भक्त की पूर्ण दृष्टि यह है कि वह जीवित इकाई की उपस्थिति को हर जगह देखता है।
