पूर्ण रूप की एक स्पष्ट अवधारणा इसके साथ दी गई है। जीवित इकाई भौतिक तत्वों से भिन्न है और सर्वोच्च जीवित इकाई, ईश्वर का व्यक्तित्व, जो भौतिक तत्वों का निर्माता है, वह भी व्यक्त जीवित इकाई से भिन्न है। यह दर्शन भगवान चैतन्य द्वारा अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्व के रूप में प्रतिपादित किया गया है। प्रत्येक वस्तु एक साथ अन्य सभी वस्तुओं के साथ एक और भिन्न है। सर्वोच्च भगवान ने अपनी भौतिक ऊर्जा द्वारा निर्मित ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भी उनसे एक साथ भिन्न और गैर-भिन्न है। भौतिक ऊर्जा सर्वोच्च प्रभु से गैर-भिन्न है, लेकिन साथ ही, क्योंकि वह ऊर्जा एक अलग तरीके से कार्य कर रही है, यह उनसे भिन्न है। इसी तरह, व्यक्तिगत जीवित इकाई सर्वोच्च प्रभु के साथ एक है और भिन्न है। यह "एक साथ एक और भिन्न" दर्शन भागवत स्कूल का पूर्ण निष्कर्ष है, जैसा कि कपिलदेव द्वारा यहां पुष्टि की गई है।
जीवित संस्थाओं की तुलना आग की चिंगारियों से की जाती है। जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है, आग, लौ, धुआं और जलाऊ लकड़ी को एक साथ जोड़ा जाता है। यहाँ जीवित इकाई, भौतिक तत्व और भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व एक साथ संयुक्त हैं। जीवित संस्थाओं की सटीक स्थिति आग की चिंगारियों की तरह ही है; वे अभिन्न अंग हैं। भौतिक ऊर्जा की तुलना धुएं से की जाती है। अग्नि भी सर्वोच्च प्रभु का अभिन्न अंग है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि हम जो कुछ भी देख या अनुभव कर सकते हैं, चाहे भौतिक या आध्यात्मिक दुनिया में, सर्वोच्च प्रभु की विभिन्न ऊर्जाओं का विस्तार है। जैसे आग अपने प्रकाश और उष्णता को एक स्थान से वितरित करती है, वैसे ही सर्वोच्च व्यक्तित्व वाला ईश्वर अपनी विभिन्न ऊर्जाओं को अपनी सृष्टि पर वितरित करता है।
वैष्णव दार्शनिक सिद्धांत के चार सिद्धांत हैं शुद्ध-अद्वैत (शुद्ध एकता), द्वैत-अद्वैत (एक साथ एक और अंतर), विशिष्ट-अद्वैत और द्वैत। वैष्णव दर्शन के सभी चार सिद्धांत इन दो श्लोकों में व्याख्या किए गए श्रीमद-भागवतम की थीसिस पर आधारित हैं।
