एक ब्रह्मचारी अविवाहित होता है, अपने कामुक जीवन को नियंत्रण में रखता है। कोई भी योग का अभ्यास नहीं कर सकता है और बिना सीमा के कामुक जीवन का आनंद उठाए; यह मूर्खता है। कुछ तथाकथित योगी प्रचार करते है की कोई जैसा चाहे वैसा आनंद ले सकता है और साथ ही एक योगी भी बन सकता है, लेकिन यह पूरी तरह से अनाधिकृत है। यहाँ यह बहुत स्पष्ट रूप से बताया गया है की व्यक्ति को अविवाहित रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य का अर्थ है की कोई अपने जीवन को सिर्फ ब्रह्मा या पूर्ण कृष्ण भक्ति में व्यतीत करे। जो कामुकता से बहुत अधिक आदी होते हैं, वो वो नियम का पालन नहीं कर सकते जो उन्हें कृष्ण भक्ति की और ले जाएँगे। कामुक जीवन को केवल विवाहित लोगों तक सीमित रखना चाहिए। एक व्यक्ति जिसका कामुक जीवन विवाह तक सीमित है, वो भी ब्रह्मचारी कहलाता है।
अस्तेयम शब्द भी एक योगी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। अस्तेयम का अर्थ है "चोरी न करना"। व्यापक अर्थो में, जो भी अपनी जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करता है, वो चोर है। आध्यात्मिक साम्यवाद के अनुसार, कोई भी अपनी निजी देखभाल से ज्यादा एकत्र नहीं कर सकता। यही प्रकृति का नियम है। कोई भी जो अपनी ज़रूरत से ज़्यादा पैसा या अधिक संपत्ति इकट्ठा करता है उसे चोर कहा जाता है, और जो भगवान को बिना दान या पूजा के लिए खर्च किए धन को इकट्ठा करता है, वो एक महान चोर है।
स्वाध्याय का मतलब है "प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों को पढ़ना"। भले ही कोई कृष्ण भक्त ना हो और वो योग प्रणाली का अभ्यास कर रहा हो, उसे समझने के लिए मानक वैदिक साहित्य को पढ़ना चाहिए। केवल योग करना पर्याप्त नहीं है। गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय में एक महान भक्त और आचार्य, नरसिंह दास ठाकुर कहते हैं कि सभी आध्यात्मिक गतिविधियों को तीन स्रोतों से समझा जाना चाहिए, जैसे कि पवित्र व्यक्ति, मानक शास्त्र और आध्यात्मिक गुरु। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए ये तीनों मार्गदर्शक बहुत महत्वपूर्ण हैं। आध्यात्मिक गुरु भक्ति सेवा के योग को बढ़ाने के लिए मानक शास्त्र का सुझाव देते हैं, तथा वो खुद भी केवल पवित्र संदर्भों से ही बोलते हैं। इसलिए योग के निष्पादन के लिए मानक शास्त्रों का अध्ययन करना आवश्यक है। मानक साहित्य को पढ़े बिना योग का अभ्यास करना केवल समय की बर्बादी है।
