श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.28.39 
यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथङ्‌मर्त्य: प्रतीयते ।
अप्यात्मत्वेनाभिमताद्देहादे: पुरुषस्तथा ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
पारिवारिक और धन-संपत्ति के प्रति गहरे लगाव के कारण इंसान बेटे और संपत्ति को अपना मानता है और भौतिक शरीर से प्रेम होने के कारण वह सोचता है कि यह मेरा है। लेकिन वास्तविकता में जिस प्रकार मनुष्य समझ सकता है कि उसका परिवार और संपत्ति उससे भिन्न हैं, उसी तरह मुक्त आत्मा समझ सकती है कि वह और उसका शरीर एक नहीं हैं।
 
Due to excessive love for family and property, a man starts considering his son and property as his own and due to his love for the physical body, he thinks that it is his. But in reality, just as a man can understand that his family and property are separate from him, similarly a liberated soul can understand that he and his body are not one.
तात्पर्य
वास्तविक ज्ञान की स्थिति इस श्लोक में समझाई गई है। कई बच्चे हैं, पर हम कुछ बच्चों को अपने स्नेह के कारण अपने पुत्र और पुत्री के रूप में स्वीकार करते हैं, यद्यपि हम भली प्रकार जानते हैं कि ये बच्चे हमसे भिन्न हैं। इसी प्रकार, धन के प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण, हम बैंक में कुछ राशि को अपना होने का दावा करते हैं। इसी प्रकार, हम दावा करते हैं कि शरीर हमारा है क्योंकि हम उससे स्नेह करते हैं। मैं कहता हूँ कि यह "मेरा" शरीर है। फिर मैं उस स्वामित्व के भाव को और आगे बढ़ाकर कहता हूँ, "यह मेरा हाथ है, मेरा पैर है", और आगे भी, "यह मेरा बैंक बैलेंस है, मेरा बेटा है, मेरी बेटी है"। पर वास्तव में मैं जानता हूँ कि पुत्र और धन मुझसे अलग हैं। शरीर के साथ भी यही है; मैं अपने शरीर से अलग हूँ। यह समझने का प्रश्न है, और उचित समझ को प्रतीबुद्ध कहते हैं। भक्ति सेवा या कृष्ण चेतना में ज्ञान प्राप्त करके, कोई मुक्त आत्मा बन सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)