ऐसे मुक्त योगी के इन्द्रियों सहित शरीर की ज़िम्मेदारी स्वयं भगवान उठा लेते हैं, और वो शरीर तब तक कार्य करता रहता है जब तक उसके तय किये गये कार्य पूरे नहीं हो जाते। अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति जागरूक होने के कारण और योग की सर्वोच्च परमावस्था, समाधि में स्थित होने के कारण मुक्त भक्त, शरीर से जुडी चीज़ों को अपना नहीं मानता है। इसलिए वो अपने शारीरिक कार्यों को सपने में किये गये कार्यों की तरह मानता है।
The Lord takes upon Himself the responsibility of the body of such a liberated Yogi, including his senses, and this body continues to function until its divine activities are over. Thus, the liberated devotee, conscious of his natural state and in the highest state of Yoga, Samadhi, does not accept the secondary fruits of the body as his own. Thus, he considers his bodily activities as activities performed in a dream.
तात्पर्य
निम्नलिखित प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। जब तक मुक्त आत्मा शरीर के संपर्क में है, शारीरिक गतिविधियाँ उसे प्रभावित क्यों नहीं करतीं? क्या वह वास्तव में भौतिक क्रियाओं की प्रतिक्रिया से दूषित नहीं हो जाता? ऐसे प्रश्नों के उत्तर के रूप में, यह श्लोक समझाता है कि एक मुक्त आत्मा के भौतिक शरीर को भगवान द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यह जीवित इकाई के जीवित बल के कारण कार्य नहीं कर रहा है; यह केवल पिछली गतिविधियों की प्रतिक्रिया के रूप में कार्य कर रहा है। बंद होने के बाद भी, एक इलेक्ट्रिक पंखा कुछ समय तक चलता रहता है। वह हलचल विद्युत धारा के कारण नहीं है, बल्कि अंतिम हलचल की निरंतरता है; इसी तरह, हालाँकि एक मुक्त आत्मा एक साधारण आदमी की तरह कार्य करती हुई प्रतीत होती है, उसके कार्यों को पिछली गतिविधियों की निरंतरता के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। एक सपने में कोई खुद को कई शरीरों से विस्तारित हुआ देख सकता है, लेकिन जागने पर वह समझ सकता है कि वे शरीर सभी झूठे थे। इसी तरह, यद्यपि एक मुक्त आत्मा के शरीर के उप-उत्पाद होते हैं - बच्चे, पत्नी, घर, आदि - वह अपने आप को उन शारीरिक विस्तारों से नहीं जोड़ता है। वह जानता है कि वे सभी भौतिक स्वप्न के उत्पाद हैं। स्थूल शरीर पदार्थ के स्थूल तत्वों से बना है, और सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार और दूषित चेतना से बना है। यदि कोई सपने के सूक्ष्म शरीर को झूठा मान सकता है और खुद को उस शरीर के साथ नहीं जोड़ सकता है, तो निश्चित रूप से एक जागृत व्यक्ति को स्थूल शरीर से पहचान करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे कि जागने वाले व्यक्ति का सपने में शरीर की गतिविधियों से कोई संबंध नहीं होता, उसी प्रकार जागृत, मुक्त आत्मा का वर्तमान शरीर की गतिविधियों से कोई संबंध नहीं होता। दूसरे शब्दों में, क्योंकि वह अपने संवैधानिक पद से परिचित है, वह जीवन की शारीरिक अवधारणा को कभी स्वीकार नहीं करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥