देहं च तं न चरम: स्थितमुत्थितं वा
सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् ।
दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध: ॥ ३७ ॥
अनुवाद
अपना असली स्वरूप प्राप्त कर लेने के कारण पूर्णतया सिद्ध जीव को इसका कोई आभास नहीं होता कि उसका भौतिक शरीर किस प्रकार गतिमान है या कार्य कर रहा है, उसी प्रकार जिस प्रकार कोई मदिरापान करने वाला व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह कपड़े पहने हुए है या नहीं।
Having attained his true nature, the fully perfected being has no sense of how the physical body is moving or functioning, just as a person who is intoxicated cannot understand whether he has clothes on his body or not.
तात्पर्य
इस जीवन अवस्था की व्याख्या रूप गोस्वामी ने अपने भक्ति रसामृत सिंधु में की है। जिस व्यक्ति का मन, इच्छा पूरी तरह से परम भगवान के साथ एकाकार हैं, और जो १०० फ़ीसदी भगवान की सेवा में संलग्न है अपने भौतिक शरीर की माँगों को भूल जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥