श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.28.36 
सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या
तस्मिन्महिम्न्यवसित: सुखदु:खबाह्ये ।
हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दु:खयोर्यत्
स्वात्मन्विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठ: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार परम दिव्य स्तर पर रहते हुए मन समस्त भौतिक प्रभावों से मुक्त होकर अपनी शान में रम जाता है जो भौतिक संकल्पनाओं से परे सुख और दुख से परे है। इस समय योगी भगवान के साथ अपने संबंध के बारे में सच्चाई का एहसास करता है। उसे पता चलता है कि सुख और दुख और उनकी परस्पर क्रिया, जिसे वह स्वयं के कारण मानता था, वास्तव में अज्ञान के कारण उत्पन्न अहंकार से उत्पन्न होती है।
 
Thus the mind in the highest transcendental state retires from all karmic reactions and becomes established in its own glory, which is beyond all material perception of pleasure and pain. At that time the Yogi becomes aware of his relationship with the Supreme. He realizes that pleasure and pain and their interactions, which he thought were caused by him, were actually caused by ego born of ignorance.
तात्पर्य
परमपुरुष भगवान से अपने संबंध को भूलना अज्ञान का परिणाम है। योगाभ्यास के द्वारा कोई अपने इस अज्ञान को मिटा सकता है कि वह परमात्मा से स्वतंत्र है। किसी का वास्तविक संबंध सदैव प्रेम वाला होता है। जीव का उद्देश्य है प्रभु को उत्तम प्रेममयी सेवा देना। उस मधुर संबंध को भूलना अज्ञान कहलाता है, और अज्ञान में कोई प्रकृति के तीन भौतिक गुणों से प्रेरित होकर अपने आपको भोक्ता समझने लगता है। जब भक्त का मन शुद्ध हो जाता है और वह समझ जाता है कि उसका मन परमपुरुष भगवान की इच्छाओं के साथ तालमेल कराया जाना है, तो वह पूर्ण, उत्तम अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जो भौतिक दुख और सुख की अनुभूति से परे होता है।

जब तक कोई अपने आप कार्रवाई करता है, वह तमाम भौतिक कथित सुख और दुख की अनुभूतियों के अधीन होता है। वास्तव में कोई सुख नहीं है। जिस तरह कि पागल की किसी भी गतिविधि में कोई सुख नहीं होता, उसी तरह भौतिक गतिविधियों में सुख और दुख के मानसिक भ्रम झूठे होते हैं। वास्तव में हर चीज दुख है।

जब मन को प्रभु की इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेषित किया जाता है, तो कोई उत्तम अवस्था को प्राप्त कर लेता है। भौतिक प्रकृति पर शासन करने की इच्छा अज्ञान का कारण है, और जब वह इच्छा पूरी तरह से मिट जाती है और इच्छाएँ परमपुरुष की इच्छाओं के साथ तालमेल बिठा लेती हैं, तो कोई पूर्ण अवस्था पर पहुँच जाता है। उपलभ्द-परमात्मा-काष्ठः। उपलभ्द का अर्थ है "अनुभूति"। अनुभूति निश्चित रूप से वैयक्तिकता का संकेत देती है। पूर्ण, मुक्त अवस्था में, वास्तविक अनुभूति होती है। निवृत्ति का अर्थ है कि जीव अपनी वैयक्तिकता बनाए रखता है; एकता का मतलब है कि वह जीव परमपुरुष के सुख में सुख का अनुभव करता है। परमपुरुष के पास सुख के अलावा कुछ नहीं है। आनंदमयोऽभ्यासात: प्रभु स्वभाव से उत्तम आनंद से भरे हुए हैं। मुक्त अवस्था में, परमपुरुष के साथ एकता का अर्थ है कि व्यक्ति को सुख के अलावा अन्य कोई अनुभूति नहीं होती। लेकिन व्यक्ति फिर भी विद्यमान रहता है, अन्यथा यह शब्द "उपलभ्द", जो उत्तम आनंद की व्यक्तिगत अनुभूति को इंगित करता है, इस्तेमाल नहीं किया गया होता।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)