जब तक कोई अपने आप कार्रवाई करता है, वह तमाम भौतिक कथित सुख और दुख की अनुभूतियों के अधीन होता है। वास्तव में कोई सुख नहीं है। जिस तरह कि पागल की किसी भी गतिविधि में कोई सुख नहीं होता, उसी तरह भौतिक गतिविधियों में सुख और दुख के मानसिक भ्रम झूठे होते हैं। वास्तव में हर चीज दुख है।
जब मन को प्रभु की इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेषित किया जाता है, तो कोई उत्तम अवस्था को प्राप्त कर लेता है। भौतिक प्रकृति पर शासन करने की इच्छा अज्ञान का कारण है, और जब वह इच्छा पूरी तरह से मिट जाती है और इच्छाएँ परमपुरुष की इच्छाओं के साथ तालमेल बिठा लेती हैं, तो कोई पूर्ण अवस्था पर पहुँच जाता है। उपलभ्द-परमात्मा-काष्ठः। उपलभ्द का अर्थ है "अनुभूति"। अनुभूति निश्चित रूप से वैयक्तिकता का संकेत देती है। पूर्ण, मुक्त अवस्था में, वास्तविक अनुभूति होती है। निवृत्ति का अर्थ है कि जीव अपनी वैयक्तिकता बनाए रखता है; एकता का मतलब है कि वह जीव परमपुरुष के सुख में सुख का अनुभव करता है। परमपुरुष के पास सुख के अलावा कुछ नहीं है। आनंदमयोऽभ्यासात: प्रभु स्वभाव से उत्तम आनंद से भरे हुए हैं। मुक्त अवस्था में, परमपुरुष के साथ एकता का अर्थ है कि व्यक्ति को सुख के अलावा अन्य कोई अनुभूति नहीं होती। लेकिन व्यक्ति फिर भी विद्यमान रहता है, अन्यथा यह शब्द "उपलभ्द", जो उत्तम आनंद की व्यक्तिगत अनुभूति को इंगित करता है, इस्तेमाल नहीं किया गया होता।
