निर्वाण का सबसे अच्छा उदाहरण भगवद्गीता में दिया गया है। प्रारंभ में अर्जुन का मन श्री कृष्ण की इच्छा से भटका हुआ था। श्री कृष्ण चाहते थे कि अर्जुन युद्ध करें, पर अर्जुन नहीं करना चाहता था, इसलिए उनके विचारों में भिन्नता थी। पर भगवान से भगवद्-गीता सुनने के पश्चात्, अर्जुन ने अपने मन को श्री कृष्ण की इच्छा से मिला दिया। इसे एकता कहा जाता है। हालाँकि, इस एकता में अर्जुन और श्री कृष्ण ने अपनी निजी पहचान नहीं खोई थी। मायावादी दार्शनिक इसे नहीं समझ सकते। वे सोचते हैं कि एकता का अर्थ है व्यक्तिगत पहचान को खो देना। परंतु वास्तव में हम देखते हैं कि भगवद्गीता में व्यक्तिगत पहचान नष्ट नहीं होती है। जब मन ईश्वर के प्रेम में पूर्ण रूप से पवित्र हो जाता है, तो मन प्रभु श्री भगवान का मन ही बन जाता है। उस समय मन स्वतंत्रता से कार्य नहीं करता, न ही यह प्रभु की इच्छा पूरी करने के लिए प्रेरणा के बिना कार्य करता है। मुक्त आत्मा का कोई और कार्य नहीं होता है। प्रतिनिवृत्त-गुण-प्रवाहाः। संपूर्ण अवस्था में मन सदैव भौतिक जगत के तीन गुणों द्वारा प्रेरित क्रियाकलापों में व्यस्त रहता है, पर आध्यात्मिक अवस्था में, भौतिक गुण भक्त के मन को विचलित नहीं कर पाते। भक्त का एकमात्र उद्देश्य प्रभु की इच्छा को पूरा करना है। यही पूर्णता की सर्वोच्च अवस्था है, जिसे निर्वाण या निर्वाण-मुक्ति कहा जाता है। इस अवस्था में मन भौतिक इच्छा से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।
यथार्चीः। अर्ची का अर्थ है 'ज्वाला'। जब दीपक टूट जाता है या तेल खत्म हो जाता है, तो हम देखते हैं कि दीपक की ज्वाला बुझ जाती है। पर वैज्ञानिक समझ के अनुसार, ज्वाला बुझती नहीं है; वह संरक्षित रहती है। यह ऊर्जा का संरक्षण है। इसी प्रकार, जब मन भौतिक तल पर कार्य करना बंद कर देता है, तो वह प्रभु के कार्यकलापों में संरक्षित हो जाता है। मायावादी दार्शनिकों द्वारा मन के कार्यों की समाप्ति की अवधारणा यहाँ स्पष्ट की गई है: मानसिक कार्यों की समाप्ति का अर्थ है भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में संचालित गतिविधियों की समाप्ति।
