ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है कि व्यक्ति को चौबीसों घंटे भगवान की सेवा में संलग्न रहना चाहिए। प्रेमांजना-चुरिता का चरण पूर्ण प्रेम विकसित करके प्राप्त किया जा सकता है। जब भक्ति सेवा में भगवान के परम व्यक्तित्व के लिए किसी का प्रेम पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है, तो वह हमेशा प्रभु को देखता है, भले ही कृत्रिम रूप से उनके रूप पर ध्यान न भी दे रहा हो। उसकी दृष्टि दिव्य है क्योंकि उसकी कोई अन्य व्यस्तता नहीं है। आध्यात्मिक प्राप्ति के इस चरण में मन को कृत्रिम रूप से लगाने की आवश्यकता नहीं है। चूंकि निम्न चरणों में अनुशंसित ध्यान भक्ति सेवा के मंच पर आने का एक साधन है, इसलिए जो पहले से ही प्रभु की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में लगे हुए हैं, वे ऐसे ध्यान से ऊपर हैं। पूर्णता के इस चरण को कृष्ण चेतना कहा जाता है।
