यहाँ कहा गया है कि प्रभु के गले की सुंदरता कौस्तुभ मणि की सुंदरता को बढ़ाती है, न कि इसके विपरीत। मणि स्वयं इसलिए अधिक सुंदर हो जाती है क्योंकि वह भगवान के गले पर स्थित होती है। इसलिए एक योगी को प्रभु के गले पर ध्यान लगाने की अनुशंसा की जाती है। प्रभु के पारलौकिक रूप पर या तो मन में ध्यान किया जा सकता है या मंदिर में एक मूर्ति के रूप में रखा जा सकता है और इस तरह से सजाया जा सकता है कि हर कोई उस पर विचार कर सके। इसलिए मंदिर पूजा उन व्यक्तियों के लिए है जो इतने उन्नत नहीं हैं कि वे प्रभु के रूप पर ध्यान कर सकें। मंदिर में लगातार आने और प्रभु के पारलौकिक रूप को सीधे देखने में कोई अंतर नहीं है; उनका मूल्य समान है। योगी का लाभप्रद स्थान यह है कि वह एकांत स्थान में कहीं भी बैठकर भगवान के रूप पर ध्यान कर सकता है। हालांकि, एक कम उन्नत व्यक्ति को मंदिर जाना पड़ता है, और जब तक वह मंदिर नहीं जाता, वह भगवान के रूप को देखने में असमर्थ होता है। या तो सुनने, देखने या ध्यान करने से, उद्देश्य प्रभु का पारलौकिक रूप है; शून्यता या अवैयक्तिकता का कोई प्रश्न नहीं है। प्रभु या तो मंदिर के आगंतुक, ध्यान करने वाले योगी या श्रीमद-भागवतम या भगवद-गीता जैसे शास्त्रों से प्रभु के पारलौकिक रूप के बारे में सुनने वाले पर पारलौकिक आनंद का आशीर्वाद दे सकते हैं। भक्ति सेवा को निष्पादित करने के लिए नौ प्रक्रियाएं हैं, जिनमें से स्मरणम, या ध्यान, एक है। योगी स्मरणम की प्रक्रिया का लाभ उठाते हैं, जबकि भक्ति-योगी सुनने और जप करने की प्रक्रिया का विशेष लाभ उठाते हैं।
