श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.28.26 
वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूते:
पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम् ।
कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं
कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
फिर योगी को भगवान के वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए जो देवी महालक्ष्मी का आवास है। भगवान का वक्षस्थल मन के लिए समस्त दिव्य आनन्द तथा नेत्रों को पूर्ण संतोष प्रदान करने वाला है। फिर योगी को अपने मन में सम्पूर्ण विश्व द्वारा पूजित भगवान की गर्दन का ध्यान धारण करना चाहिए। भगवान की गर्दन उनके वक्षस्थल पर लटकने वाले कौस्तुभ मणि की सुंदरता को बढ़ाने वाली है।
 
Then the yogi should meditate on the Lord's chest which is the abode of Goddess Mahalakshmi. The Lord's chest gives all transcendental pleasure to the mind and full satisfaction to the eyes. Then the yogi should meditate in his mind on the Lord's neck which is worshipped by the entire universe. The Lord's neck enhances the beauty of the Kaustubha Mani hanging on His chest.
तात्पर्य
उपनिषदों में कहा गया है कि प्रभु की विविध ऊर्जाएँ सृजन, विनाश और पालन करने के लिए कार्य करती हैं। ऊर्जा की ये अचिन्त्य किस्में प्रभु के हृदय में संग्रहीत हैं। जैसा कि लोग आमतौर पर कहते हैं, ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं। उस वीर्यता का प्रतिनिधित्व सभी ऊर्जाओं के भण्डार महा-लक्ष्मी द्वारा किया जाता है, जो प्रभु के दिव्य रूप के हृदय पर स्थित है। जो योगी प्रभु के पारलौकिक रूप पर उस स्थान पर पूरी तरह से ध्यान लगा सकता है, वह कई भौतिक शक्तियाँ प्राप्त कर सकता है, जिसमें योग प्रणाली की आठ सिद्धियाँ शामिल हैं।

यहाँ कहा गया है कि प्रभु के गले की सुंदरता कौस्तुभ मणि की सुंदरता को बढ़ाती है, न कि इसके विपरीत। मणि स्वयं इसलिए अधिक सुंदर हो जाती है क्योंकि वह भगवान के गले पर स्थित होती है। इसलिए एक योगी को प्रभु के गले पर ध्यान लगाने की अनुशंसा की जाती है। प्रभु के पारलौकिक रूप पर या तो मन में ध्यान किया जा सकता है या मंदिर में एक मूर्ति के रूप में रखा जा सकता है और इस तरह से सजाया जा सकता है कि हर कोई उस पर विचार कर सके। इसलिए मंदिर पूजा उन व्यक्तियों के लिए है जो इतने उन्नत नहीं हैं कि वे प्रभु के रूप पर ध्यान कर सकें। मंदिर में लगातार आने और प्रभु के पारलौकिक रूप को सीधे देखने में कोई अंतर नहीं है; उनका मूल्य समान है। योगी का लाभप्रद स्थान यह है कि वह एकांत स्थान में कहीं भी बैठकर भगवान के रूप पर ध्यान कर सकता है। हालांकि, एक कम उन्नत व्यक्ति को मंदिर जाना पड़ता है, और जब तक वह मंदिर नहीं जाता, वह भगवान के रूप को देखने में असमर्थ होता है। या तो सुनने, देखने या ध्यान करने से, उद्देश्य प्रभु का पारलौकिक रूप है; शून्यता या अवैयक्तिकता का कोई प्रश्न नहीं है। प्रभु या तो मंदिर के आगंतुक, ध्यान करने वाले योगी या श्रीमद-भागवतम या भगवद-गीता जैसे शास्त्रों से प्रभु के पारलौकिक रूप के बारे में सुनने वाले पर पारलौकिक आनंद का आशीर्वाद दे सकते हैं। भक्ति सेवा को निष्पादित करने के लिए नौ प्रक्रियाएं हैं, जिनमें से स्मरणम, या ध्यान, एक है। योगी स्मरणम की प्रक्रिया का लाभ उठाते हैं, जबकि भक्ति-योगी सुनने और जप करने की प्रक्रिया का विशेष लाभ उठाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)