श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.28.24 
ऊरू सुपर्णभुजयोरधिशोभमानाव्-
ओजोनिधी अतसिकाकुसुमावभासौ ।
व्यालम्बिपीतवरवाससि वर्तमान
काञ्चीकलापपरिरम्भि नितम्बबिम्बम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
फिर, ध्यान में योगी को अपना मन भगवान् की ऊँची जाँघों पर स्थित करना चाहिए, जो समस्त शक्ति की आगार हैं। ये जाँघें अलसी के फूलों की कान्ति के समान सफेद-नीली हैं और जब भगवान् गरुड़ पर विराजते हैं तो अत्यंत भव्य लगती हैं। योगी को चाहिए कि वह भगवान् के सुडौल कलाओं का ध्यान धरे, जो करधनी से घिरे हुए है और यह करधनी भगवान् के घुटनों तक लटकते पीताम्बर पर टिकी हुई है।
 
Then, in meditation, the yogi should fix his mind on the thighs of the Lord, which are the repository of all energy. They are white-blue like the lustre of linseed flowers, and when the Lord rides on Garuda, these thighs look most magnificent. The yogi should meditate on the rounded buttocks of the Lord, which are surrounded by a girdle, which rests on the yellow cloth of the Lord hanging down to the heels.
तात्पर्य
परमात्मा के व्यक्तित्व में सभी शक्तियों का भंडार है। उनकी शक्ति उनके दैवीय शरीर की जांघों पर टिकी है। उनका पूरा शरीर वैभव से भरा हुआ है: समस्त संपदाएँ, समस्त शक्ति, समस्त प्रसिद्धि, समस्त सुंदरता, सभी ज्ञान और सभी त्याग। योगी को सलाह दी जाती है कि वह भगवान के दिव्य रूप का ध्यान चरणों के तलवों से शुरू करते हुए धीरे-धीरे घुटनों तक, फिर जांघों तक और अंत में चेहरे तक जाएँ। परम व्यक्तित्व भगवान के ध्यान करने की प्रणाली उनके पैरों से शुरू होती है।

भगवान के दिव्य रूप का वर्णन मंदिरों में मूर्ति, आर्क-विग्रह में बिल्कुल दर्शाया गया है। आम तौर पर, भगवान की मूर्ति के शरीर के निचले हिस्से को पीले रेशम से ढका जाता है। यह वैकुण्ठ पोशाक है, या वह पोशाक जो भगवान आध्यात्मिक आकाश में पहनते हैं। यह वस्त्र भगवान के टखनों तक फैला हुआ है। इस प्रकार, चूँकि योगी के पास ध्यान करने के लिए बहुत सारे दिव्य उद्देश्य हैं, इसलिए उनके लिए किसी काल्पनिक चीज़ पर ध्यान करने का कोई कारण नहीं है, जैसा कि उन तथाकथित योगियों का अभ्यास है जिनका उद्देश्य अवैयक्तिक है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)