पहली अनुशंसा स्व-धर्माचरणम है। जब तक हमारे पास यह भौतिक शरीर है, तब तक हमारे लिए विभिन्न कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। ऐसे कर्तव्यों को चार सामाजिक व्यवस्थाओं द्वारा विभाजित किया गया है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ये विशिष्ट कर्तव्य शास्त्र में दिए गए हैं, और विशेष रूप से भगवद-गीता में। स्व-धर्माचरणम का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने समाज के विशेष विभाजन के निर्धारित कर्तव्यों का ईमानदारी से और अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के अनुसार पालन करना चाहिए। व्यक्ति को दूसरे का कर्तव्य स्वीकार नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष समाज या समुदाय में जन्म लेता है, तो उसे उस विशेष विभाजन के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। हालाँकि, यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष समाज या समुदाय में जन्म के पदनाम को पार करने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली है, तो उसका स्व-धर्म, या कर्तव्य, केवल भगवान श्रीकृष्ण की सेवा करना है। कृष्ण चेतना में उन्नत व्यक्ति का वास्तविक कर्तव्य भगवान की सेवा करना है। जब तक कोई जीवन की शारीरिक अवधारणा में बना रहता है, वह सामाजिक परंपरा के कर्तव्यों के अनुसार कार्य कर सकता है, लेकिन यदि कोई आध्यात्मिक मंच पर ऊपर उठाया जाता है, तो उसे केवल सर्वोच्च भगवान की सेवा करनी चाहिए; यह स्व-धर्म का वास्तविक निष्पादन है।
