स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम् ।
प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा ॥ १९ ॥
अनुवाद
इस प्रकार भक्ति में हमेशा डूबे रहकर योगी को अपने अंतर में भगवान खड़े, चलते, लेटे या बैठे हुए दिखते हैं, क्योंकि भगवान के खेल हमेशा सुंदर और आकर्षक होते हैं।
Thus, being always absorbed in devotion, the yogi sees God standing, walking, lying down or sitting within himself, because the Supreme Lord's pastimes are beautiful and attractive.
तात्पर्य
स्वयं में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप पर ध्यान करने की प्रक्रिया और भगवान की महिमा और लीलाओं का वर्णन करने की प्रक्रिया समान है। फर्क बस इतना है कि भगवान की लीलाओं को सुनना और उस पर दिमाग लगाना भगवान के रूप को अपने हृदय में लाने से आसान है क्योंकि जैसे ही कोई भगवान के बारे में सोचता है, खास तौर पर इस युग में, दिमाग विचलित हो जाता है, और इतना विक्षोभ होने के कारण, दिमाग में भगवान को देखने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। जब भगवान की दिव्य लीलाओं की प्रशंसा करते हुए कंपन होता है, तो व्यक्ति सुनने के लिए बाध्य होता है। सुनने की वह प्रक्रिया दिमाग में जाती है, और योग का अभ्यास अपने आप हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक बच्चा भी बस भागवतम् से पढ़कर ही सुन सकता है और भगवान की लीलाओं पर ध्यान करने का लाभ ले सकता है जिसमें भगवान को अपनी गायों और दोस्तों के साथ चरागाह जाते हुए दिखाया गया है। सुनने में दिमाग लगाना भी शामिल है। कलियुग के इस युग में, भगवान चैतन्य ने सुझाया है कि हर किसी को हमेशा भागवत गीता पढ़ने और सुनने में व्यस्त रहना चाहिए। भगवान ये भी कहते हैं कि महान आत्माएं या महात्मा हमेशा भगवान की महिमा का वर्णन करने की प्रक्रिया में व्यस्त रहते हैं और केवल सुनने से ही, दूसरे भी वही लाभ प्राप्त कर लेते हैं। योग में भगवान की दिव्य लीलाओं पर ध्यान लगाना जरूरी है, चाहे वे खड़े हों, चल रहे हों, लेटे हों, आदि।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥