श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.28.16 
काञ्चीगुणोल्लसच्छ्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम् ।
दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
कमर और कूल्हों पर करधनी लपेटे, वो अपने भक्तों के हृदय-कमल पर खड़े हैं। उन्हें देखना बेहद मनमोहक है और उनका शांत स्वरूप देखने वालों की आँखों और आत्माओं को खुशी देने वाला है।
 
He has a girdle around his waist and hips and is standing on the heart-lotus of his devotees. He is very attractive to look at and his peaceful form is a delight to the eyes and souls of the devotees who see him.
तात्पर्य
इस श्लोक में इस्तेमाल किया गया दर्शनीयतम शब्द यह बताता है कि भगवान इतने सुंदर हैं कि भक्त-योगी किसी और को देखने की इच्छा नहीं रखते। भगवान को देखने की उनकी इच्छा पूरी तरह से भगवान को देखने से ही संतुष्ट हो जाती है। भौतिक दुनिया में हम सुंदरता देखना चाहते हैं, लेकिन यह इच्छा कभी संतुष्ट नहीं होती। भौतिक संदूषण के कारण, भौतिक दुनिया में हम जो भी प्रवृति महसूस करते हैं, वे कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। लेकिन जब हमारे देखने, सुनने, छूने आदि की इच्छाएं भगवान के परम व्यक्तित्व को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो जाती हैं, तो वे सर्वोच्च पूर्णता के स्तर पर होती हैं।

हालाँकि भगवान का शाश्वत रूप में परम व्यक्तित्व भक्त के दिल के लिए इतना सुंदर और मनभावन है, लेकिन वह उन निजीकरणवादियों को आकर्षित नहीं करते हैं, जो उनके अवैयक्तिक पहलू पर ध्यान लगाना चाहते हैं। ऐसा अवैयक्तिक ध्यान मात्र निष्फल श्रम है। वास्तविक योगी, आधी बंद आँखों से, भगवान के परम व्यक्तित्व के रूप पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि किसी भी शून्य या अवैयक्तिक पर।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)