श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.28.15 
मत्तद्विरेफकलया परीतं वनमालया ।
परार्ध्यहारवलयकिरीटाङ्गदनूपुरम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
वह अपने गले में आकर्षक वन-पुष्पों की माला भी धारण करते हैं जिसकी लुभावनी सुगंध से मधुमक्खियों का झुंड माला के चारों ओर मंडराता रहता है। मोती की माला, मुकुट, चूड़ियों के एक जोड़े, बाजूबंदों और नूपुरों से वह अत्यंत सुंदर ढंग से सुशोभित हैं।
 
He also wears around his neck an attractive garland of wild flowers whose fragrance makes swarms of bees buzz around the garland. He is exquisitely adorned with a pearl necklace, a crown, a pair of bracelets, armlets and anklets.
तात्पर्य
इस वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान की फूलों की माला ताज़ी है। असल में, वैकुण्ठ या आध्यात्मिक आकाश में ताज़गी के सिवा और कुछ नहीं होता। यहाँ के पेड़ों और पौधों से तोड़े गये फूल भी ताज़े रहते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक आकाश में सब कुछ अपनी मूलता बनाए रखता है और मुरझाता नहीं। पेड़ों से तोड़कर माला बनाए जाने वाले फूलों की सुगंध मुरझाती नहीं, क्योंकि पेड़ और फूल दोनों ही आध्यात्मिक हैं। जब फूल को पेड़ से तोड़ा जाता है, तब वह वैसा ही बना रहता है; वह अपनी सुगंध नहीं खोता। भँवरों का आकर्षण फूलों के प्रति एक जैसा ही बना रहता है, चाहे वे फूल माला में हों या पेड़ों पर। आध्यात्मिकता का अर्थ है कि सब कुछ शाश्वत और अक्षय है। हर चीज़ से ली हुई हर चीज़ हर चीज़ की ही बनी रहती है या जैसा बताया गया है, आध्यात्मिक संसार में एक घटाने एक एक ही होता है और एक जोड़ने एक एक ही होता है। भँवरे ताज़े फूलों के इर्द-गिर्द भिनभिनाते हैं और उनकी इस मधुर ध्वनि का भगवान आनंद लेते हैं। भगवान की चूड़ियाँ, हार, मुकुट और पायल सभी अमूल्य रत्नों से सजे हुए हैं। चूँकि रत्न और मोती आध्यात्मिक हैं, इसलिए उनके मूल्य का कोई भौतिक मूल्यांकन नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)