श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.28.11 
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषान् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
प्राणायाम विधि के अभ्यास से व्यक्ति अपने शारीरिक दोषों को पूरी तरह से खत्म कर सकता है और अपने मन को एकाग्र करके वह सभी पापकर्मों से मुक्त हो सकता है। इंद्रियों को अपने वश में करके व्यक्ति खुद को भौतिक संसार से मुक्त कर सकता है और ईश्वर के ध्यान के द्वारा वह भौतिक आसक्ति के तीनों गुणों से मुक्त हो सकता है।
 
By practising Pranayama, a man can completely eradicate his bodily defects and by concentrating his mind, he can be free from all sins. By controlling the senses, a man can free himself from physical contact and by meditating on God, he can be free from the three qualities of physical attachment.
तात्पर्य
आयुर्वेदिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार तीन चीजें कफ, पित्त और वायु(बलगम,पित्त और वायु) शरीर की शारीरिक स्थिति को बनाए रखती हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस शारीरिक विश्लेषण को मान्य नहीं मानता है, परंतु आयुर्वेदिक उपचार की प्राचीन प्रक्रिया इन चीजों पर आधारित है। आयुर्वेदिक उपचार इन तीनों तत्वों के कारणों से ही संबंधित है, जिनका भगवतम में शरीर की बुनियादी स्थितियों के रूप में कई जगह उल्लेख है। यहाँ यह सिफारिश की जाती है कि प्राणायाम की श्वास लेने की प्रक्रिया का अभ्यास करने से व्यक्ति मुख्य शारीरिक तत्वों द्वारा बनाए गए संदूषण से मुक्त हो सकता है, मन को केंद्रित करने से वह पापमय क्रियाकलापों से मुक्त हो सकता है, और इंद्रियों को वापस लेने से वह भौतिक संघ से मुक्त कर सकता है। अंततः, सर्वोच्च भगवान के व्यक्तित्व पर ध्यान करना होता है ताकि पारलौकिक स्थिति में ऊपर उठाया जा सके जहाँ वह अब भौतिक प्रकृति के तीनों प्रकारों से प्रभावित नहीं होता। भगवद्-गीता में यह भी पुष्टि की गई है कि जो कोई स्वयं को निष्कलंक भक्ति सेवा में संलग्न करता है वह तुरंत भौतिक प्रकृति के तीनों प्रकारों से ऊपर उठ जाता है और तुरंत ब्रह्म के साथ अपनी पहचान का एहसास करता है। सा गुणां समतीत्यैतान ब्रह्मभूयाय कल्पते। योग प्रणाली में हर आइटम के लिए भक्ति-योग में एक समानांतर गतिविधि है, लेकिन भक्ति-योग का अभ्यास इस युग के लिए आसान है। भगवान चैतन्य द्वारा जो पेश किया गया वह एक नई व्याख्या नहीं है। भक्ति-योग एक व्यावहारिक प्रक्रिया है जो जप और श्रवण से शुरू होती है। भक्ति-योग और अन्य योगों का अंतिम लक्ष्य भगवान का एक ही व्यक्तित्व है, लेकिन एक व्यावहारिक है, और अन्य कठिन हैं। व्यक्ति को अपनी शारीरिक स्थिति को एकाग्रता और इंद्रियों पर संयम से शुद्ध करना होता है; तभी वह अपने मन को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर स्थिर कर सकता है। जिसे समाधि कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)