श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.28.10 
मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिन: ।
वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
प्राणायाम का अभ्यास करने वाले योगी तुरन्त सभी मानसिक अशांति से मुक्त हो जाते हैं, उसी तरह जैसे आग में रखा सोना और उसपर हवा की फुहार चलने से सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं।
 
Yogis who practise this Pranayama are instantly freed from all mental agitations, just as gold placed in fire becomes free of all impurities when blown by a shower of air.
तात्पर्य
मन को शुद्ध करने की इस प्रक्रिया की सिफारिश भगवान चैतन्य ने भी की है; वे कहते हैं कि हरे कृष्ण का जाप करना चाहिए। वे आगे कहते हैं, परम विजयते : "श्री कृष्ण संकीर्तन के लिए सभी महिमा!" कृष्ण के पवित्र नामों के जाप करने को सभी महिमा दी जाती है क्योंकि जैसे ही कोई इस जाप की प्रक्रिया शुरू करता है, मन शुद्ध हो जाता है। चेत-दर्शन-मार्जनम: कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करने से मन में जमी हुई मैल धुल जाती है। कोई तेजस्वी साँस लेने की प्रक्रिया या जाप प्रक्रिया से मन को शुद्ध कर सकता है, जिस प्रकार एक आग में डालकर फूँक मारने पर सोने को शुद्ध किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)