श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.27.8 
यद‍ृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ्‍मुनि: ।
विविक्तशरण: शान्तो मैत्र: करुण आत्मवान् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
भक्त को बहुत अधिक कठिनाई के बिना जो कुछ वह कमा सके उसी में सन्तोष प्राप्त करना चाहिए। इस से अधिक उसे नहीं खाना चाहिए। उसे एकान्त स्थान में रहना चाहिए और सदैव विचारवान, शान्त, मैत्रीपूर्ण, उदार तथा स्वरूपसिद्ध होना चाहिए।
 
भक्त को बहुत अधिक कठिनाई के बिना जो कुछ वह कमा सके उसी में सन्तोष प्राप्त करना चाहिए। इस से अधिक उसे नहीं खाना चाहिए। उसे एकान्त स्थान में रहना चाहिए और सदैव विचारवान, शान्त, मैत्रीपूर्ण, उदार तथा स्वरूपसिद्ध होना चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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