यहाँ एक और शब्द है 'मित-भुक्'। इसका मतलब है कि व्यक्ति को शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए केवल उतना ही खाना चाहिए जितना कि आवश्यक हो। व्यक्ति को केवल जीभ को संतुष्ट करने के लिए लालची नहीं होना चाहिए। अनाज, फल, दूध और इसी तरह के भोजन मानव उपभोग के लिए आवंटित किए गए हैं। व्यक्ति को केवल जीभ को संतुष्ट करने और उस चीज़ को खाने का अत्यधिक इच्छुक नहीं होना चाहिए जो कि मानवता के लिए नहीं है। विशेष रूप से, एक भक्त को केवल प्रसाद या वही भोजन खाना चाहिए जो कि भगवान को अर्पित किया गया हो। उसकी स्थिति उन खाद्य पदार्थों के अवशेषों को स्वीकार करने की है। भोले भाले भोजन जैसे कि अनाज, सब्ज़ियों, फलों, फूलों और दूध की सामग्री को भगवान को अर्पित किया जाता है और इसलिए वासना और अज्ञानता के भाव में भोजन अर्पित करने का कोई दायरा नहीं है। एक भक्त को लालची नहीं होना चाहिए। यह भी सिफ़ारिश की जाती है कि भक्त 'मुनी' या विचारशील होना चाहिए; उसे हमेशा कृष्ण के बारे में सोचना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि भगवान को कैसे बेहतर सेवा दी जाए। उसे केवल यही चिंता करनी चाहिए। जिस प्रकार एक भौतिकवादी हमेशा अपनी भौतिक स्थिति में सुधार करने के बारे में विचारशील रहता है, उसी प्रकार एक भक्त के विचारों को हमेशा कृष्ण चेतना में अपनी स्थिति में सुधार करने में लगाया जाना चाहिए; इसलिए उसे एक 'मुनी' होना चाहिए।
**अगला अनुशंसित विषय यह है कि भक्त को एकांत जगह में रहना चाहिए।** सामान्यतः एक सामान्य व्यक्ति पाउंड, शिलिंग और पेंस या जीवन में भौतिकवादी उन्नति में रुचि रखता है जो एक भक्त के लिए अनावश्यक है। भक्त को रहने के लिए ऐसी जगह का चयन करना चाहिए जहाँ प्रत्येक भक्ति भावना में रुचिपूर्ण हो। सामान्यतः इसीलिए एक भक्त किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर जाता है जहाँ भक्त रहते हैं। यह अनुशंसित है कि वह ऐसी जगह पर रहे जहाँ बहुत सारे सामान्य लोग न हों। एकांत स्थान (विविक्त-शरण) में रहना बहुत महत्वपूर्ण है। अगला विषय शांत या शांति है। भक्त को व्याकुल नहीं होना चाहिए। उसे अपनी प्राकृतिक आमदनी से संतुष्ट होना चाहिए, केवल अपनी सेहत रखने के लिए उतना ही खाना चाहिए, एकांत स्थान में रहना चाहिए और हमेशा शांत रहना चाहिए। कृष्ण चेतना की खोज के लिए मन की शांति आवश्यक है।
**अगला विषय मैत्र, मैत्री है।** भक्त को प्रत्येक के प्रति मैत्रीपूर्ण होना चाहिए, लेकिन उसकी घनिष्ठ मित्रता केवल भक्तों के साथ ही होनी चाहिए। अन्य के साथ उसे शिष्टाचारपूर्ण होना चाहिए। वह कह सकता है, "हाँ, सर, जो आप कहते हैं वह ठीक है," लेकिन वह उनके साथ घनिष्ठ नहीं होता है। परन्तु एक भक्त को उन व्यक्तिओं के प्रति करूणा दिखानी चाहिए जो मासूम हैं, जो न तो नास्तिक हैं और न ही आध्यात्मिक उपलब्धि में बहुत अधिक प्रगति कर चुके हैं। एक भक्त को उनके प्रति करूणा दिखानी चाहिए और उन्हें यथासंभव कृष्ण चेतना में प्रगति के लिए शिक्षा देनी चाहिए। भक्त को हमेशा आत्मवान या अपनी आध्यात्मिक स्थिति में स्थित रहना चाहिए। उसे भूलना नहीं चाहिए कि उसकी मुख्य चिंता आध्यात्मिक चेतना या कृष्ण चेतना में प्रगति करना है, और उसे अपने को शरीर या मन से मूर्खतावश पहचान नहीं करनी चाहिए। आत्मा का अर्थ है शरीर या मन, लेकिन यहाँ आत्मवान शब्द का विशेष अर्थ यह है कि व्यक्ति आत्मविश्वासी होना चाहिए। उसे हमेशा शुद्ध चेतना में स्थित रहना चाहिए कि वह आत्मा है और एक भौतिक शरीर या मन नहीं है। इससे वह कृष्ण चेतना में निश्चिंतता से प्रगति करता है।
