सर्वभूतसमत्वेन निर्वैरेणाप्रसङ्गत: ।
ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥ ७ ॥
अनुवाद
भक्तिमय सेवा पूरी करने में व्यक्ति को हर जीव को समान रूप से देखना पड़ता है, बिना किसी के प्रतिकूलता और बिना किसी से गहरे लगाव के। उसे ब्रह्मचर्य व्रत रखना पड़ता है, गंभीर होना पड़ता है और अपने सनातन कर्मों को करते हुए परिणाम भगवान को अर्पित करने पड़ते हैं।
In performing devotional service, a person has to look at every living being with equanimity and without any animosity towards anyone and without any intimacy. He has to observe the vow of celibacy, be serious and perform his daily duties while offering the fruits of his actions to God.
तात्पर्य
भगवान के एक भक्त जो गंभीरता से भक्ति सेवा में लगे हुए हैं, वह सभी जीवों के बराबर है। जीवों की विभिन्न प्रजातियाँ हैं, लेकिन एक भक्त बाहरी आच्छादन नहीं देखता; वह शरीर में निवास करने वाली आंतरिक आत्मा को देखता है। क्योंकि प्रत्येक आत्मा भगवान का ही अंश है, इसलिए वह कोई अंतर नहीं देखता। यही एक विद्वान भक्त की दृष्टि है। जैसा कि भगवद्-गीता में बताया गया है, एक भक्त या एक विद्वान ऋषि एक विद्वान ब्राह्मण, एक कुत्ते, एक हाथी या एक गाय के बीच कोई अंतर नहीं देखता क्योंकि वह जानता है कि शरीर केवल बाहरी आवरण है और आत्मा वास्तव में भगवान का अंश है। एक भक्त का किसी भी जीव से कोई वैर नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह सभी के साथ घुलता-मिलता है। यह निषिद्ध है। अप्रसंगत का अर्थ है "हर किसी के साथ अंतरंग संपर्क में न रहना।" एक भक्त अपनी भक्ति सेवा के निष्पादन के साथ चिंतित है, और इसलिए उसे अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए केवल भक्तों के साथ ही मेलजोल करना चाहिए। उसका दूसरों के साथ मिलने-जुलने का कोई काम नहीं है, क्योंकि हालाँकि वह किसी को भी अपना शत्रु नहीं मानता है, लेकिन उसका व्यवहार केवल भक्ति सेवा में लगे लोगों के साथ ही होता है। एक भक्त को ब्रह्मचर्य का व्रत अवश्य करना चाहिए। ब्रह्मचर्य की आवश्यकता नहीं है कि व्यक्ति पूरी तरह से यौन जीवन से मुक्त हो; ब्रह्मचर्य के व्रत के तहत भी अपनी पत्नी के साथ संतुष्टि की अनुमति है। सबसे अच्छी नीति यौन जीवन से पूरी तरह से बचना है। यह बेहतर है। अन्यथा, एक भक्त धार्मिक सिद्धांतों के तहत शादी कर सकता है और एक पत्नी के साथ शांतिपूर्वक रह सकता है। एक भक्त को व्यर्थ में बात नहीं करनी चाहिए। एक गंभीर भक्त के पास बकवास करने के लिए समय नहीं होता। वह कृष्ण चेतना में हमेशा व्यस्त रहता है। जब भी वह बोलता है, वह कृष्ण के बारे में बोलता है। मौना का अर्थ है "मौन।" मौन का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को बिल्कुल भी बोलना नहीं चाहिए, बल्कि यह कि उसे बकवास नहीं बोलना चाहिए। उसे कृष्ण के बारे में बात करने में बहुत उत्साही होना चाहिए। यहाँ वर्णित एक और महत्वपूर्ण वस्तु स्व-धर्मेण है, यानी अपने शाश्वत व्यवसाय में विशेष रूप से व्यस्त रहना, जो कि भगवान के शाश्वत सेवक के रूप में कार्य करना है, या कृष्ण भावना में कार्य करना है। अगला शब्द, बलीयसा, का अर्थ है "सभी गतिविधियों के परिणामों को भगवान को अर्पित करना।" एक भक्त अपने व्यक्तिगत खाते पर इंद्रिय-तृप्ति के लिए कार्य नहीं करता है। वह जो कुछ भी कमाता है, जो कुछ भी खाता है और जो कुछ भी करता है, वह भगवान को संतुष्टि के लिए अर्पित करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥