भावना, या भाव, योगाभ्यास या किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया में एक बहुत महत्वपूर्ण कारक है। भगवद्-गीता (१०.८) में भाव का वर्णन किया गया है। बुधा भाव-समन्विताः : भगवान कृष्ण के प्रेम विचार में व्यक्ति को लीन हो जाना चाहिए। जब कोई जानता है कि भगवान कृष्ण, परम देव, सब कुछ के स्रोत हैं और सब कुछ उन्हीं से निकले हैं (अहं सर्वस्य प्रभवः), तब वे वेदांत सूत्र जनमाद्यस्य यतः ("सब कुछ का मूल स्रोत") समझ सकते हैं, और फिर वे भाव में या भक्ति के प्रारंभिक चरणों में लीन हो सकते हैं।
रूप गोस्वामी बहुत अच्छी तरह से अपने भक्तिरसामृतसिन्धु में इस बात को समझाते हैं कि किस तरह से भाव या ईश्वर प्रेम के प्रारंभिक चरण को हासिल किया जाता है। वे कहते हैं कि सबसे पहले हर किसी को निष्ठावान बनना होगा (श्रद्धायान्वितः)। निष्ठा इंद्रियों पर नियंत्रण करके, या तो योगाभ्यास, नियमों और कायदों का पालन करके या बैठने की मुद्राओं का अभ्यास करके या फिर सीधे भक्ति-योग में लगकर हासिल की जाती है, जैसा कि पिछले पद में अनुशंसित किया गया है। भक्ति-योग की नौ अलग-अलग वस्तुओं में से पहली और सबसे महत्वपूर्ण है भगवान के बारे में सुनना और भजन करना। इसका ज़िक्र यहाँ भी किया गया है। मत-कथा-श्रवणेन च। कोई भगवान की प्रणाली के नियमों और कायदों का पालन करके निष्ठा के मानक पर आ सकते हैं, और यही लक्ष्य केवल भगवान के दिव्य कार्यों को सुनने और भजन करने से भी हासिल किया जा सकता है। कै शब्द महत्वपूर्ण है। भक्ति-योग सीधा है, और दूसरी प्रक्रिया अप्रत्यक्ष है। लेकिन अगर अप्रत्यक्ष प्रक्रिया को भी अंगीकार किया जाता है, तो सफलता तभी मिलती है जब कोई भगवान के यशों को सुनने और भजन करने की सीधी प्रक्रिया का पूरा पालन करता है। इसी कारण यहाँ सत्येन शब्द का प्रयोग किया गया है। इस संदर्भ में स्वामी श्रीधर ने टिप्पणी देते हुए कहा है कि सत्येन का अर्थ निष्कपटेन से है, "बिना ढोंग के"। निराकारवादी ढोंग से भरे हुए होते हैं। कभी-कभी वे ढोंग से भक्ति भाव का अनुसरण करते हैं, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य परम से एक बनना होता है। यह ढोंग है, कपट। भागवतम् इस ढोंग को अनुमति नहीं देता है। श्रीमद्-भागवतम् की शुरुआत में स्पष्ट तौर पर कहा गया है, परमो निर्मत्सराणाम : "यह ग्रंथ श्रीमद्-भागवतम् उन लोगों के लिए है जो ईर्ष्या से पूरी तरह से मुक्त हैं"। यही बात फिर से यहाँ भी ज़ोर देकर कही गई है। जब तक कोई परम देव के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान नहीं हो जाता है और भगवान की महिमा को सुनने और भजन करने की प्रक्रिया में खुद को शामिल नहीं कर लेता है, तब तक मुक्ति की कोई संभावना नहीं है।
