श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.27.5 
अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि ।
भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक बद्धजीव का कर्तव्य है कि वह भौतिक सुखों की लिप्सा में लिप्त अपनी अपवित्र चेतना को पूरे समर्पण और वैराग्य के साथ गहरी भक्ति में लगाए। इस तरह उसका मन और चेतना पूरी तरह से नियंत्रण में आ जाएँगे।
 
It is the duty of every conditioned soul to engage his polluted consciousness, which is attached to material enjoyment, in deep devotional service with detachment. In this way his mind and consciousness will be completely controlled.
तात्पर्य
इस श्लोक में मुक्ति की प्रक्रिया को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। पदार्थ प्रकृति में व्यक्ति के बंधे होने के कारण उसके द्वारा स्वंय के भोक्ता, स्वामी या सभी जीवों का मित्र होने के बारे में सोचना है। यह झूठी सोच, इंद्रियों के भोग पर विचार करने का परिणाम है। जब कोई सोचता है कि वह अपने देशवासियों, समाज या मानवता के लिए सबसे अच्छा मित्र है और वह विभिन्न राष्ट्रवादी, परोपकारी और परोपकारी गतिविधियों में संलग्न है, तो यह सब इंद्रियों की तृप्ति पर ध्यान केंद्रित करने जैसा है। तथाकथित राष्ट्रीय नेता या मानवतावादी सभी की सेवा नहीं करता है; वह केवल अपनी इंद्रियों की सेवा करता है। यह एक तथ्य है। लेकिन बंधी हुई आत्मा इसे समझ नहीं पाती क्योंकि वह भौतिक प्रकृति के मंत्र से हैरान है। इसलिए इस श्लोक में यह सिफारिश की गई है कि व्यक्ति भगवान की भक्ति सेवा में बहुत गंभीरता से जुड़े। इसका मतलब यह है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह स्वामी, उपकारक, मित्र या भोगी है। उसे हमेशा यह पता होना चाहिए कि वास्तविक भोक्ता कृष्ण हैं, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व; यही भक्ति-योग का मूल सिद्धांत है। किसी को इन तीन सिद्धांतों के बारे में दृढ़ विश्वास होना चाहिए: व्यक्ति को हमेशा यह सोचना चाहिए कि कृष्ण स्वामी हैं, कृष्ण भोक्ता हैं और कृष्ण मित्र हैं। न केवल उसे स्वयं इन सिद्धांतों को समझना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों को समझाने और कृष्ण चेतना का प्रचार करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे ही कोई भगवान की ऐसी गंभीर भक्ति सेवा में संलग्न होता है, स्वाभाविक रूप से भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व का झूठा दावा करने की प्रवृत्ति गायब हो जाती है। उस वैराग्य को वैराग्य कहा जाता है। तथाकथित भौतिक प्रभुता में लीन होने के बजाय, कोई कृष्ण चेतना में संलग्न होता है; वह चेतना का नियंत्रण है। योग प्रक्रिया के लिए इंद्रियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है। योग इंद्रिय-संयमः। चूँकि इंद्रियाँ हमेशा सक्रिय रहती हैं, उनकी गतिविधियों को भक्ति सेवा में लगाया जाना चाहिए - कोई भी उनकी गतिविधियों को नहीं रोक सकता है। यदि कोई इंद्रियों की गतिविधियों को कृत्रिम रूप से रोकना चाहता है, तो उसका प्रयास विफल हो जाएगा। यहाँ तक कि महान योगी विश्वामित्र, जो योग की प्रक्रिया से अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे, मेनका की सुंदरता का शिकार हो गए। ऐसे कई उदाहरण हैं। जब तक व्यक्ति का मन और चेतना भक्ति सेवा में पूरी तरह से संलग्न नहीं हो जाती, तब तक मन के लिए इंद्रियों की तृप्ति की इच्छाओं में व्यस्त रहने का अवसर हमेशा रहता है। इस श्लोक में उल्लिखित एक विशेष बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कहा गया है, प्रसक्तम असतां पथि: मन हमेशा असत की ओर आकर्षित होता है, जो कि अस्थायी, भौतिक अस्तित्व है। क्योंकि हम अनादि काल से भौतिक प्रकृति से जुड़े हुए हैं, इसलिए हम इस अस्थायी भौतिक प्रकृति के प्रति अपने लगाव के आदी हो गए हैं। मन को परम भगवान के शाश्वत कमल चरणों में स्थिर करना होगा। सा वई मनः कृष्ण-पदारविंदयोः। मन को कृष्ण के कमल चरणों में स्थिर करना है; तब सब कुछ बहुत अच्छा हो जाएगा। इस प्रकार इस श्लोक में भक्ति-योग की गंभीरता पर जोर दिया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)