सशर्त अस्तित्व का वर्णन यहाँ ध्यायतो विषयान् अस्य के रूप में किया गया है। विषय का अर्थ है "आनंद की वस्तु।" जब तक व्यक्ति यह सोचता रहता है कि वह भौतिक लाभों का आनंद ले सकता है, वह सशर्त जीवन में है, लेकिन जैसे ही वह अपने होश में आता है, तो उसे यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि वह भोगी नहीं है, क्योंकि एकमात्र भोगी भगवान हैं। जैसा कि भगवद-गीता (5.29) में पुष्टि की गई है, वह सभी बलिदानों और तपस्याओं के परिणामों के भोगी हैं (भोक्तारं यज्ञ-तपसां), और वह तीनों लोकों के स्वामी हैं (सर्व-लोक-महेश्वरम)। वह सभी जीवों का वास्तविक मित्र है। लेकिन इसके बजाय कि हम स्वामित्व, भोग और सभी जीवों के मित्र के रूप में वास्तविक स्थिति को भगवान को छोड़ दें, हम दावा करते हैं कि हम स्वामी हैं, भोगी हैं और मित्र हैं। हम परोपकारी कार्य करते हैं, यह सोचकर कि हम मानव समाज के मित्र हैं। कोई स्वयं को एक बहुत अच्छा राष्ट्रीय कार्यकर्ता, लोगों और देश का सबसे अच्छा मित्र घोषित कर सकता है, लेकिन वास्तव में वह सभी का सबसे बड़ा मित्र नहीं हो सकता है। एकमात्र मित्र कृष्ण हैं। व्यक्ति को सशर्त आत्मा की चेतना को उस स्तर तक ऊपर उठाने का प्रयास करना चाहिए जिस स्तर पर यह समझ आए कि कृष्ण उसका वास्तविक मित्र है। यदि कोई कृष्ण से मित्रता करता है, तो उसे कभी धोखा नहीं मिलेगा, और उसे अपनी आवश्यकता की सभी सहायता मिलेगी। सशर्त आत्मा में इस चेतना को जगाना सबसे बड़ी सेवा है, न कि किसी अन्य जीवित इकाई के महान मित्र के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करना। दोस्ती की शक्ति सीमित होती है। यद्यपि कोई मित्र होने का दावा करता है, लेकिन वह असीमित रूप से मित्र नहीं हो सकता। असीमित संख्या में जीवित इकाइयाँ हैं, और हमारे संसाधन सीमित हैं; इसलिए हम आम लोगों के लिए किसी भी वास्तविक लाभ के नहीं हो सकते हैं। आम लोगों के लिए सबसे बड़ी सेवा उन्हें कृष्ण चेतना के प्रति जागृत करना है ताकि वे यह जान सकें कि सर्वोच्च भोक्ता, सर्वोच्च मालिक और सर्वोच्च मित्र कृष्ण हैं। तब भौतिक प्रकृति पर अधिकार जमाने का यह भ्रामक सपना गायब हो जाएगा।
