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श्लोक 3.27.30  |
यदा न योगोपचितासु चेतो
मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग ।
अनन्यहेतुष्वथ मे गति: स्याद्
आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहास: ॥ ३० ॥ |
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| अनुवाद |
| जब सिद्ध योगी का मन योग शक्ति की गौण वस्तुओं, जो बाहरी शक्ति के प्रकटीकरण हैं, की ओर आकर्षित नहीं होता, तब मेरी ओर उसकी प्रगति असीमित होती है और इस तरह मृत्यु भी उस पर विजय पाने में असमर्थ रहती है। |
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| जब सिद्ध योगी का मन योग शक्ति की गौण वस्तुओं, जो बाहरी शक्ति के प्रकटीकरण हैं, की ओर आकर्षित नहीं होता, तब मेरी ओर उसकी प्रगति असीमित होती है और इस तरह मृत्यु भी उस पर विजय पाने में असमर्थ रहती है। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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