यदा न योगोपचितासु चेतो
मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग ।
अनन्यहेतुष्वथ मे गति: स्याद्
आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहास: ॥ ३० ॥
अनुवाद
जब सिद्ध योगी का मन योग शक्ति की गौण वस्तुओं, जो बाहरी शक्ति के प्रकटीकरण हैं, की ओर आकर्षित नहीं होता, तब मेरी ओर उसकी प्रगति असीमित होती है और इस तरह मृत्यु भी उस पर विजय पाने में असमर्थ रहती है।
When the attention of a perfected Yogi is not attracted towards the secondary aspects of yogic power, which are the manifestations of the external power, then his progress towards Me is unlimited and thus he can never be defeated by death.
तात्पर्य
योगी, आमतौर पर रहस्मयी योग शक्ति के उपोत्पादों की ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि वे सबसे छोटे से भी छोटे या सबसे बड़े से भी बड़े बन सकते हैं, वे अपनी किसी भी इच्छा को प्राप्त कर सकते हैं, उनके पास एक ग्रह बनाने की शक्ति होती है या वे अपनी पसंद के किसी को भी अपने अधीन कर सकते हैं। जोगी, जिनके पास भक्ति योग के परिणामों की अधूरी जानकारी होती है, वे इन शक्तियों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन ये शक्तियाँ भौतिक होती हैं, इनका आध्यात्मिक प्रगति से कोई लेना-देना नहीं होता है। जिस तरह अन्य भौतिक शक्तियाँ भौतिक ऊर्जा से बनती हैं, उसी तरह रहस्यमयी योग भी भौतिक होता है। एक पूर्ण योगी का मन किसी भी भौतिक शक्ति की ओर आकर्षित नहीं होता है, बल्कि केवल परम प्रभु के प्रति निःस्वार्थ सेवा की ओर ही आकर्षित होता है। एक भक्त के लिए, ब्रह्म के तेज में विलय होने की प्रक्रिया को नारकीय माना जाता है, और योग शक्ति या योग शक्ति की प्रारंभिक सिद्धि, जो कि इंद्रियों को नियंत्रित करने में सक्षम होती है, स्वचालित रूप से प्राप्त हो जाती है। जहाँ तक उच्च ग्रहों पर उन्नयन की बात है, एक भक्त इसे केवल मतिभ्रम मानता है। एक भक्त का ध्यान केवल प्रभु की अनन्त प्रेममय सेवा पर ही केंद्रित रहता है, और इसलिए मृत्यु की शक्ति का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी भक्तिमय स्थिति में, एक पूर्ण योगी अमर ज्ञान और आनंद की स्थिति प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥