श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  3.27.28-29 
मद्भक्त: प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा ।
नि:श्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥ २८ ॥
प्राप्नोतीहाञ्जसा धीर: स्वद‍ृशाच्छिन्नसंशय: ।
यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिङ्गाद्विनिर्गमे ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
मेरा भक्त मेरी असीम, कारणों से रहित कृपा से वास्तव में आत्म-साक्षात्कारी हो जाता है। इस प्रकार, सभी शंकाओं से मुक्त होकर, वह अपने नित्य धाम की ओर निरंतर प्रगति करता है, जो मेरी असीम आध्यात्मिक शक्ति के प्रत्यक्ष संरक्षण में है। यही जीव की चरम पूर्णता का लक्ष्य है। वर्तमान भौतिक शरीर को त्यागने के पश्चात्, योगी भक्त उस पराम्परिक धाम को प्राप्त होता है और कभी वापस नहीं लौटता।
 
My devotee, by My infinite causeless grace, becomes truly self-realized and thus, freed from all doubts, he proceeds towards his destination, which is under My spiritual power of pure bliss. This is the ultimate destination (self-establishment) of the soul. After giving up this body, the Yogi devotee goes to that divine abode from which he never returns.
तात्पर्य
असली आत्मज्ञान का मतलब भगवान का शुद्ध भक्त बनना है। भक्त के अस्तित्व का मतलब भक्ति और भक्ति का लक्ष्य है। आत्मज्ञान का असली मतलब ईश्वर और जीव को समझना है; खुद को और ईश्वर और जीव के बीच प्रेममय सेवाओं के आपसी आदान-प्रदान को जानना असली आत्मज्ञान है। इसे अवैयक्तिकतावादी या अन्य पारलौकिकतावादी हासिल नहीं कर सकते; वे भक्ति सेवा के विज्ञान को नहीं समझ सकते। भक्ति सेवा शुद्ध भक्त को भगवान की असीमित बिना किसी कारणवाली दया से प्रकट होती है। यहाँ विशेष रूप से भगवान ने इस बारे में बताया है: मत-प्रसादेना, "मेरी खास कृपा से।" यह भगवद गीता में भी पुष्टि की गई है। केवल वही लोग जो प्रेम और विश्वास के साथ भक्ति सेवा को अपनाते हैं, उन्हें ईश्वर से उतनी बुद्धि मिलती है जिससे वो धीरे-धीरे और प्रगति करते हुए ईश्वर के घर पहुँच सकते हैं।

निःश्रेयस का मतलब है "अंतिम मंजिल।" स्व-संस्थान दिखाता है कि अवैयक्तिकतावादियों के पास रहने के लिए कोई खास जगह नहीं है। अवैयक्तिकतावादी अपना व्यक्तित्व त्याग देते हैं ताकि जीव की चिंगारी भगवान के पारलौकिक शरीर से निकलने वाले अवैयक्तिक तेज में विलीन हो जाए, लेकिन भक्त का एक विशिष्ट निवास है। ग्रह सूरज की रोशनी में विश्राम करते हैं, लेकिन सूरज की रोशनी की खुद की कोई खास विश्राम वाली जगह नहीं होती। जब कोई खास ग्रह पर पहुँचता है, तभी उसकी एक विश्राम वाली जगह होती है। आध्यात्मिक आकाश, जो कैवल्य के तौर पर जाना जाता है, हर तरफ बस आनंदमय प्रकाश होता है, और ये ईश्वर की सुरक्षा में है। जैसा कि भगवद गीता (14.27) में कहा गया है, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम: अवैयक्तिक ब्रह्म तेज भगवान के शरीर पर विश्राम करता है। दूसरे शब्दों में, ईश्वर का शारीरिक तेज कैवल्य है, या अवैयक्तिक ब्रह्म। उस अवैयक्तिक तेज में आध्यात्मिक ग्रह होते हैं, जिन्हें वैकुंठों के तौर पर जाना जाता है, जिनमें से मुख्य कृष्णलोक है। कुछ भक्त वैकुंठ ग्रहों तक ऊंचे उठते हैं, और कुछ कृष्णलोक ग्रह तक। भक्त की चाहत के मुताबिक, उसे एक खास निवास दिया जाता है, जिसे स्व-संस्थान के तौर पर जाना जाता है, उसकी चाहत की जगह। भगवान की कृपा से, भक्ति सेवा में लगा आत्मज्ञानी भक्त भौतिक शरीर में भी अपने लक्ष्य को समझता है। इसलिए वो अपनी भक्ति गतिविधियों को निरंतर बिना संदेह किए निभाता है, और अपने भौतिक शरीर को त्यागने के बाद वो तुरंत उस लक्ष्य तक पहुँच जाता है जिसके लिए उसने खुद को तैयार किया है। उस निवास तक पहुँचने के बाद, वो फिर कभी इस भौतिक दुनिया में वापस नहीं आता है।

यहाँ प्रयुक्त श्ब्द "लिंगाद विनिर्गमे" का मतलब है "दो तरह के भौतिक शरीरों, सूक्ष्म और स्थूल से मुक्त होने के बाद।" सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार और संदूषित चेतना से बना है, और स्थूल शरीर पाँच तत्वों - पृथ्वी, पानी, आग, हवा और आकाश से बना है। जब किसी को आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित किया जाता है, तो वो इस भौतिक दुनिया के सूक्ष्म और स्थूल शरीर, दोनों को त्याग देता है। वो अपने शुद्ध, आध्यात्मिक शरीर में आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है और एक आध्यात्मिक ग्रह में रहता है। हालाँकि अवैयक्तिकतावादी भी सूक्ष्म और स्थूल भौतिक शरीर को त्यागने के बाद उस आध्यात्मिक आकाश तक पहुँचते हैं, लेकिन उन्हें आध्यात्मिक ग्रहों में नहीं रखा जाता; उनकी चाहत के अनुसार उन्हें भगवान के पारलौकिक शरीर से निकलने वाले आध्यात्मिक तेज में विलीन होने दिया जाता है। स्व-संस्थान शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसा कोई भी जीव खुद को तैयार करता है, वैसे ही उसे अपना निवास मिलता है। अवैयक्तिकतावादियों को अवैयक्तिक ब्रह्म तेज दिया जाता है, लेकिन जो वैकुंठों में नारायण के तौर पर या कृष्णलोक में कृष्ण के तौर पर भगवान के पारलौकिक रूप में शामिल होना चाहते हैं, वो उस निवास तक जाते हैं, जहाँ से वो कभी वापस नहीं लौटते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)