निःश्रेयस का मतलब है "अंतिम मंजिल।" स्व-संस्थान दिखाता है कि अवैयक्तिकतावादियों के पास रहने के लिए कोई खास जगह नहीं है। अवैयक्तिकतावादी अपना व्यक्तित्व त्याग देते हैं ताकि जीव की चिंगारी भगवान के पारलौकिक शरीर से निकलने वाले अवैयक्तिक तेज में विलीन हो जाए, लेकिन भक्त का एक विशिष्ट निवास है। ग्रह सूरज की रोशनी में विश्राम करते हैं, लेकिन सूरज की रोशनी की खुद की कोई खास विश्राम वाली जगह नहीं होती। जब कोई खास ग्रह पर पहुँचता है, तभी उसकी एक विश्राम वाली जगह होती है। आध्यात्मिक आकाश, जो कैवल्य के तौर पर जाना जाता है, हर तरफ बस आनंदमय प्रकाश होता है, और ये ईश्वर की सुरक्षा में है। जैसा कि भगवद गीता (14.27) में कहा गया है, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम: अवैयक्तिक ब्रह्म तेज भगवान के शरीर पर विश्राम करता है। दूसरे शब्दों में, ईश्वर का शारीरिक तेज कैवल्य है, या अवैयक्तिक ब्रह्म। उस अवैयक्तिक तेज में आध्यात्मिक ग्रह होते हैं, जिन्हें वैकुंठों के तौर पर जाना जाता है, जिनमें से मुख्य कृष्णलोक है। कुछ भक्त वैकुंठ ग्रहों तक ऊंचे उठते हैं, और कुछ कृष्णलोक ग्रह तक। भक्त की चाहत के मुताबिक, उसे एक खास निवास दिया जाता है, जिसे स्व-संस्थान के तौर पर जाना जाता है, उसकी चाहत की जगह। भगवान की कृपा से, भक्ति सेवा में लगा आत्मज्ञानी भक्त भौतिक शरीर में भी अपने लक्ष्य को समझता है। इसलिए वो अपनी भक्ति गतिविधियों को निरंतर बिना संदेह किए निभाता है, और अपने भौतिक शरीर को त्यागने के बाद वो तुरंत उस लक्ष्य तक पहुँच जाता है जिसके लिए उसने खुद को तैयार किया है। उस निवास तक पहुँचने के बाद, वो फिर कभी इस भौतिक दुनिया में वापस नहीं आता है।
यहाँ प्रयुक्त श्ब्द "लिंगाद विनिर्गमे" का मतलब है "दो तरह के भौतिक शरीरों, सूक्ष्म और स्थूल से मुक्त होने के बाद।" सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार और संदूषित चेतना से बना है, और स्थूल शरीर पाँच तत्वों - पृथ्वी, पानी, आग, हवा और आकाश से बना है। जब किसी को आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित किया जाता है, तो वो इस भौतिक दुनिया के सूक्ष्म और स्थूल शरीर, दोनों को त्याग देता है। वो अपने शुद्ध, आध्यात्मिक शरीर में आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है और एक आध्यात्मिक ग्रह में रहता है। हालाँकि अवैयक्तिकतावादी भी सूक्ष्म और स्थूल भौतिक शरीर को त्यागने के बाद उस आध्यात्मिक आकाश तक पहुँचते हैं, लेकिन उन्हें आध्यात्मिक ग्रहों में नहीं रखा जाता; उनकी चाहत के अनुसार उन्हें भगवान के पारलौकिक शरीर से निकलने वाले आध्यात्मिक तेज में विलीन होने दिया जाता है। स्व-संस्थान शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण है। जैसा कोई भी जीव खुद को तैयार करता है, वैसे ही उसे अपना निवास मिलता है। अवैयक्तिकतावादियों को अवैयक्तिक ब्रह्म तेज दिया जाता है, लेकिन जो वैकुंठों में नारायण के तौर पर या कृष्णलोक में कृष्ण के तौर पर भगवान के पारलौकिक रूप में शामिल होना चाहते हैं, वो उस निवास तक जाते हैं, जहाँ से वो कभी वापस नहीं लौटते हैं।
