इस संबंध में एक उदाहरण दिया जा सकता है। जिस प्रकार एक भौतिकवादी एक बड़ा गगनचुंबी भवन बनाने में संलग्न होता है, उसी प्रकार एक भक्त विष्णु के लिए एक बड़ा मंदिर बनाने में संलग्न होता है। सतही तौर पर, गगनचुंबी भवन बनाने वाले और मंदिर बनाने वाले समान स्तर पर हैं, क्योंकि दोनों ही लकड़ी, पत्थर, लोहा और अन्य निर्माण सामग्री एकत्र कर रहे हैं। लेकिन जो व्यक्ति गगनचुंबी भवन बनाता है वह भौतिकवादी होता है और जो व्यक्ति विष्णु का मंदिर बनाता है वह आत्मराम होता है। भौतिकवादी गगनचुंबी भवन बनाकर अपने आप को अपने शरीर के संबंध में संतुष्ट करने की कोशिश करता है, लेकिन भक्त मंदिर बनाकर अपने आप से परे, भगवान को संतुष्ट करने की कोशिश करता है। हालाँकि दोनों ही भौतिक क्रियाओं में लगे हुए हैं, लेकिन भक्त मुक्त है और भौतिकवादी बाध्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भक्त, जो मंदिर का निर्माण करता है, ने अपने मन को भगवान में स्थिर किया है, लेकिन गैर-भक्त, जो गगनचुंबी भवन का निर्माण करता है, उसका मन कामुकता की तृप्ति में नियत है। यदि कोई भी गतिविधि करते समय, यहाँ तक कि भौतिक अस्तित्व में भी, किसी का मन भगवान के कमल पाँवों में स्थिर है, तो वह उलझा या बाध्य नहीं होगा। भक्ति सेवा में कर्मचारी, पूर्ण कृष्ण चेतना में, हमेशा भौतिक प्रकृति के प्रभाव से स्वतंत्र रहता है।
