श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.27.24 
भुक्तभोगा परित्यक्ता द‍ृष्टदोषा च नित्यश: ।
नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
प्रकृति पर शासन करने की इच्छा के दोषों की खोज के बाद और फलस्वरूप उस इच्छा को त्याग कर, जीव स्वतंत्र हो जाता है और अपने स्वयं के वैभव में खड़ा हो जाता है।
 
By realizing the flaws in the desire to assert dominance over nature and consequently by abandoning that desire, the soul becomes free and establishes itself in its own glory.
तात्पर्य

क्योंकि जीव वास्तव में भौतिक संसाधनों का उपभोक्ता नहीं है, इसलिए भौतिक प्रकृति पर अधिकार करने की उसकी कोशिश अंततः विफल हो जाती है। कुंठा के परिणामस्वरूप, वह सामान्य जीव से ज्यादा शक्तिशाली बनने का इच्छा रखता है और इस तरह वह सर्वोच्च उपभोक्ता के अस्तित्व में विलय होना चाहता है। इस तरह वह अधिक आनंद प्राप्त करने की योजना विकसित करता है।

जब कोई वास्तव में भक्ति सेवा में स्थित होता है, तो वह उसकी स्वतंत्र स्थिति होती है। कम बुद्धिमान लोग भगवान के शाश्वत सेवक की स्थिति को नहीं समझ सकते हैं। क्योंकि "सेवक" शब्द का उपयोग किया जाता है, इसलिए वे भ्रमित हो जाते हैं; वे समझ नहीं पाते हैं कि यह दासता इस भौतिक दुनिया की दासता नहीं है। भगवान का सेवक होना सबसे बड़ा पद है। यदि कोई इसे समझ सकता है और इस प्रकार भगवान की शाश्वत सेवा की अपनी मूल प्रकृति को पुनर्जीवित कर सकता है, तो वह पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाता है। जीव की स्वतंत्रता भौतिक संपर्क से नष्ट हो जाती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में उसकी पूर्ण स्वतंत्रता होती है, और इसलिए भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों पर निर्भर होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। भक्त द्वारा यह स्थिति प्राप्त की जाती है, और इसलिए वह दोष देखने के बाद भौतिक आनंद की प्रवृत्ति छोड़ देता है।

एक भक्त और एक निराकारवादी के बीच का अंतर यह है कि एक निराकारवादी सर्वोच्च के साथ एक होने की कोशिश करता है ताकि वह बिना किसी बाधा के आनंद ले सके, जबकि एक भक्त आनंद लेने की पूरी मानसिकता छोड़ देता है और भगवान की दिव्य प्रेम सेवा में संलग्न हो जाता है। यही उसकी संवैधानिक गौरवशाली स्थिति है। उस समय वह ईश्वर है, पूरी तरह से स्वतंत्र है। वास्तविक ईश्वर या ईश्वरः परमः, सर्वोच्च ईश्वर, या सर्वोच्च स्वतंत्र, कृष्ण है। जीव केवल तभी ईश्वर होता है जब वह भगवान की सेवा में लगा रहता है। दूसरे शब्दों में, भगवान की प्रेममयी सेवा से प्राप्त दिव्य आनंद वास्तविक स्वतंत्रता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)