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श्लोक 3.27.23  |
प्रकृति: पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् ।
तिरोभवित्री शनकैरग्नेर्योनिरिवारणि: ॥ २३ ॥ |
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| अनुवाद |
| प्रकृति का प्रभाव जीव को आच्छादित किये रहता है जिससे उसे सदैव प्रज्ज्वलित अग्नि में रहने का भान होता है। परन्तु भक्ति-भाव से साधना करने पर यह प्रभाव दूर किया जा सकता है, उसी प्रकार जैसे अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ स्वयं भी अग्नि द्वारा जलकर भस्म हो जाती हैं। |
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| प्रकृति का प्रभाव जीव को आच्छादित किये रहता है जिससे उसे सदैव प्रज्ज्वलित अग्नि में रहने का भान होता है। परन्तु भक्ति-भाव से साधना करने पर यह प्रभाव दूर किया जा सकता है, उसी प्रकार जैसे अग्नि उत्पन्न करने वाली लकड़ियाँ स्वयं भी अग्नि द्वारा जलकर भस्म हो जाती हैं। |
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