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श्लोक 3.27.22  |
ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा ।
तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसे दृढ़ता से पूर्ण ज्ञान और दिव्य दृष्टि से संपन्न भक्ति करनी चाहिए। व्यक्ति को दृढ़ता से विरक्त होना चाहिए, तपस्या में लगना चाहिए और आत्मलीनता प्राप्त करने के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए। |
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| इसे दृढ़ता से पूर्ण ज्ञान और दिव्य दृष्टि से संपन्न भक्ति करनी चाहिए। व्यक्ति को दृढ़ता से विरक्त होना चाहिए, तपस्या में लगना चाहिए और आत्मलीनता प्राप्त करने के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए। |
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