श्रुति या शास्त्र के दो प्रकार हैं। एक तो प्रभु द्वारा बोला जाता है और दूसरा प्रभु और उनके भक्तों के बारे में बोला जाता है। भगवद-गीता पहला है और श्रीमद्- भागवतम दूसरा है। गंभीर भक्ति सेवा में स्थिर होने के लिए इन शास्त्रों को बार-बार विश्वसनीय स्रोतों से सुनना चाहिए। ऐसी भक्ति सेवा में संलग्नता के माध्यम से, व्यक्ति माया के दूषण से मुक्त हो जाता है। श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में सुनने से हृदय तीनों प्रकार के भौतिक प्रकृति के प्रभाव के कारण होने वाले सभी दूषणों से साफ हो जाता है। निरंतर, नियमित सुनने से, भौतिक प्रकृति का आनंद लेने या उस पर अधिकार करने की वासना और लालच के दूषण के प्रभाव कम हो जाते हैं, और जब वासना और लालच कम हो जाती है, तो व्यक्ति अच्छाई के तरीके में स्थित हो जाता है। यह ब्रह्म साक्षात्कार या आध्यात्मिक साक्षात्कार की अवस्था है। इस तरह व्यक्ति पारलौकिक मंच पर स्थिर हो जाता है। पारलौकिक मंच पर स्थिर रहना भौतिक उलझाव से मुक्ति है।
