श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.27.21 
श्रीभगवानुवाच
अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना ।
तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा: यदि कोई गम्भीरता से मेरी भक्ति करता है और दीर्घकाल तक मेरे बारे में सुनता है या मुझसे सुनता है, तो वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार अपने-अपने निर्धारित कर्तव्यों को करने से कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी, और व्यक्ति भौतिक जगत के दोषों से मुक्त हो जाएगा।
 
The Lord said: If one serves Me sincerely and hears about Me or Me for a long time, he can attain liberation. Thus, by performing one's prescribed duties, there will be no reaction and one will be free from the contamination of matter.
तात्पर्य
इस संदर्भ में श्रीधर स्वामी टिप्पणी करते हैं कि अकेले भौतिक प्रकृति से संगति के कारण व्यक्ति सशर्त नहीं बनता है। भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा संक्रमित हो जाने के बाद ही सशर्त जीवन शुरू होता है। अगर कोई पुलिस विभाग के संपर्क में है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह एक अपराधी है। जब तक कोई आपराधिक कार्य नहीं करता है, भले ही एक पुलिस विभाग हो, उसे दंडित नहीं किया जाता है। इसी तरह, मुक्त आत्मा प्रभावित नहीं होती है, भले ही वह भौतिक प्रकृति में हो। भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व भी भौतिक प्रकृति के साथ जुड़ाव में माना जाता है जब वह अवतरित होता है, लेकिन वह प्रभावित नहीं होता है। व्यक्ति को इस तरह से कार्य करना चाहिए कि भौतिक प्रकृति में होने के बावजूद वह दूषण से प्रभावित न हो। हालाँकि कमल का फूल पानी के साथ जुड़ा हुआ है, यह पानी के साथ नहीं मिलता है। भगवान कपिलदेव (अनिमित्त-निमित्तेन स्व-धर्मेणामलात्मान) द्वारा यहां वर्णित अनुसार व्यक्ति को इसी तरह जीना चाहिए। केवल भक्ति सेवा में गंभीरता से संलग्न होकर सभी प्रतिकूल परिस्थितियों से मुक्त हुआ जा सकता है। यह भक्ति सेवा कैसे विकसित होती है और परिपक्व होती है, यहाँ समझाया गया है। शुरुआत में व्यक्ति को अपने निर्धारित कर्तव्यों को स्वच्छ मन से करना होता है। स्वच्छ चेतना का अर्थ है कृष्ण चेतना। व्यक्ति को अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन कृष्ण चेतना में करना होता है। अपने निर्धारित कर्तव्यों को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है; व्यक्ति को बस कृष्ण चेतना में कार्य करना होता है। कृष्ण-चेतन कर्तव्यों का निर्वहन करने में, व्यक्ति को यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या, अपने व्यावसायिक या व्यावसायिक कर्तव्यों के द्वारा, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व कृष्ण संतुष्ट है। भागवतम में एक अन्य स्थान पर कहा गया है, स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर् हरि-तोषनम: हर किसी को कुछ निर्धारित कर्तव्य करने होते हैं, लेकिन ऐसे कर्तव्यों की पूर्णता केवल तभी प्राप्त होगी जब भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, हरि, ऐसे कार्यों से संतुष्ट हो। उदाहरण के लिए, अर्जुन का निर्धारित कर्तव्य युद्ध करना था, और उसके युद्ध की पूर्णता का परीक्षण कृष्ण की संतुष्टि से किया गया था। कृष्ण उसे युद्ध करना चाहता था, और जब वह प्रभु की संतुष्टि के लिए लड़ा, तो वह अपने व्यावसायिक भक्ति कर्तव्य की पूर्णता थी। दूसरी ओर, जब कृष्ण की इच्छा के विपरीत वह लड़ने को तैयार नहीं था, तो वह अपूर्ण था। यदि कोई अपने जीवन को पूर्ण करना चाहता है, तो उसे कृष्ण की संतुष्टि के लिए अपने निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। व्यक्ति को कृष्ण चेतना में कार्य करना चाहिए, क्योंकि ऐसा कार्य कभी भी कोई प्रतिक्रिया (अनिमित्त-निमित्तेन) उत्पन्न नहीं करेगा। इसकी पुष्टि भगवद गीता में भी की गई है। यज्ञार्थत् कर्मणोऽन्यत्र: सभी गतिविधियां केवल यज्ञ के लिए या विष्णु की संतुष्टि के लिए करनी चाहिए। विष्णु या यज्ञ की संतुष्टि के बिना अन्यथा कुछ भी किया जाता है, बंधन उत्पन्न करता है, इसलिए यहां कपिल मुनि द्वारा यह भी निर्धारित किया गया है कि व्यक्ति कृष्ण चेतना में कार्य करके भौतिक उलझाव से पार कर सकता है, जिसका अर्थ है भक्ति सेवा में गंभीरता से संलग्न होना। यह गंभीर भक्ति सेवा लंबे समय तक सुनने से विकसित हो सकती है। जप और श्रवण भक्ति सेवा की प्रक्रिया की शुरुआत है। व्यक्ति को भक्तों के साथ जुड़ना चाहिए और उनसे भगवान के पारलौकिक रूप, गतिविधियों, अंतर्धान, निर्देशों आदि के बारे में सुनना चाहिए।

श्रुति या शास्त्र के दो प्रकार हैं। एक तो प्रभु द्वारा बोला जाता है और दूसरा प्रभु और उनके भक्तों के बारे में बोला जाता है। भगवद-गीता पहला है और श्रीमद्- भागवतम दूसरा है। गंभीर भक्ति सेवा में स्थिर होने के लिए इन शास्त्रों को बार-बार विश्वसनीय स्रोतों से सुनना चाहिए। ऐसी भक्ति सेवा में संलग्नता के माध्यम से, व्यक्ति माया के दूषण से मुक्त हो जाता है। श्रीमद्-भागवतम में कहा गया है कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में सुनने से हृदय तीनों प्रकार के भौतिक प्रकृति के प्रभाव के कारण होने वाले सभी दूषणों से साफ हो जाता है। निरंतर, नियमित सुनने से, भौतिक प्रकृति का आनंद लेने या उस पर अधिकार करने की वासना और लालच के दूषण के प्रभाव कम हो जाते हैं, और जब वासना और लालच कम हो जाती है, तो व्यक्ति अच्छाई के तरीके में स्थित हो जाता है। यह ब्रह्म साक्षात्कार या आध्यात्मिक साक्षात्कार की अवस्था है। इस तरह व्यक्ति पारलौकिक मंच पर स्थिर हो जाता है। पारलौकिक मंच पर स्थिर रहना भौतिक उलझाव से मुक्ति है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)