देवहूति बहुत बुद्धिमानी से कहती हैं, "कोई सैद्धांतिक रूप से विश्लेषण कर सकता है और कह सकता है कि ज्ञान से वह मुक्त हो गया है, लेकिन वास्तव में, जब तक कारण मौजूद है, वह स्वतंत्र नहीं है।" भगवद्-गीता इस बात की पुष्टि करती है कि कई जन्मों तक ऐसी सैद्धांतिक गतिविधियों को करने के बाद, जब कोई वास्तव में अपनी वास्तविक चेतना में आता है और सर्वोच्च भगवान कृष्ण के सामने आत्मसमर्पण करता है, तो ज्ञान में उसके शोध की पूर्ति वास्तव में प्राप्त होती है। सैद्धांतिक स्वतंत्रता और भौतिक बंधन से वास्तविक स्वतंत्रता में अंतर की एक खाई है। भागवतम (10.14.4) कहता है कि यदि कोई भक्ति सेवा के शुभ मार्ग को छोड़ देता है और केवल अटकलों से चीजों को जानने की कोशिश करता है, तो वह अपने मूल्यवान समय को बर्बाद कर देता है (क्लिश्यंती ये केवल-बोध-लब्धये)। प्रेम के ऐसे श्रम का परिणाम केवल श्रम है; कोई अन्य परिणाम नहीं है। अटकल का श्रम केवल थकावट से समाप्त होता है। उदाहरण दिया जाता है कि खाली धान की भूसी को छीलने में कोई लाभ नहीं है; चावल पहले ही चला गया है। इसी तरह, केवल सैद्धांतिक प्रक्रिया से कोई भी भौतिक बंधन से मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि कारण अभी भी मौजूद है। किसी को कारण को शून्य करना होता है, और फिर प्रभाव को शून्य कर दिया जाएगा। यह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा निम्नलिखित छंदों में समझाया गया है।
