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श्लोक 3.27.20  |
क्वचित्तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् ।
अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुन: प्रत्यवतिष्ठते ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| यदि चिन्तन और मूलभूत सिद्धांतों की जाँच-परख से बंधन के भय से बचने का प्रयास किया भी जाए तो भी यह फिर से प्रकट हो सकता है, क्योंकि इसके कारण का अभी तक कोई अंत नहीं हुआ है। |
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| यदि चिन्तन और मूलभूत सिद्धांतों की जाँच-परख से बंधन के भय से बचने का प्रयास किया भी जाए तो भी यह फिर से प्रकट हो सकता है, क्योंकि इसके कारण का अभी तक कोई अंत नहीं हुआ है। |
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