श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.27.20 
क्‍वचित्तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् ।
अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुन: प्रत्यवतिष्ठते ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
यदि चिन्तन और मूलभूत सिद्धांतों की जाँच-परख से बंधन के भय से बचने का प्रयास किया भी जाए तो भी यह फिर से प्रकट हो सकता है, क्योंकि इसके कारण का अभी तक कोई अंत नहीं हुआ है।
 
Even if one is saved from the great fear of bondage by contemplation and examination of the fundamental principles, it may still reappear, because its cause has not been eliminated.
तात्पर्य
वस्तुओं के ऊपर प्रभुता करने के अहं की वजह से स्वयं को पदार्थ के नियंत्रण में रखने से भौतिक बंधन की वजह बनती है। भगवान-गीता (7.27) में कहा गया है, ईच्छा-द्वेष-समुत्थेना। जीवित इकाई में दो प्रकार की प्रवृतियाँ उत्पन्न होती हैं। एक प्रवृत्ति ईच्छा है, जिसका अर्थ है भौतिक प्रकृति के ऊपर प्रभुता करने की इच्छा या सर्वोच्च भगवान के समान महान होने की। हर कोई इस भौतिक संसार में सबसे महान व्यक्तित्व बनने की इच्छा रखता है। द्वेष का अर्थ है "ईर्ष्या"। जब कोई कृष्ण या भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से ईर्ष्या करता है, तो वह सोचता है, "कृष्ण सभी में सभी क्यों होने चाहिए? मैं भी कृष्ण के समान अच्छा हूँ।" ये दो चीजें, भगवान बनने की इच्छा और भगवान से ईर्ष्या करना, भौतिक बंधन का मूल कारण है। जब तक एक दार्शनिक, मुक्तिदाता या शून्यवादी के पास सर्वोच्च बनने, सब कुछ बनने या ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने की कुछ इच्छा है, तब तक कारण बना रहता है और उसकी मुक्ति का कोई सवाल ही नहीं है।

देवहूति बहुत बुद्धिमानी से कहती हैं, "कोई सैद्धांतिक रूप से विश्लेषण कर सकता है और कह सकता है कि ज्ञान से वह मुक्त हो गया है, लेकिन वास्तव में, जब तक कारण मौजूद है, वह स्वतंत्र नहीं है।" भगवद्-गीता इस बात की पुष्टि करती है कि कई जन्मों तक ऐसी सैद्धांतिक गतिविधियों को करने के बाद, जब कोई वास्तव में अपनी वास्तविक चेतना में आता है और सर्वोच्च भगवान कृष्ण के सामने आत्मसमर्पण करता है, तो ज्ञान में उसके शोध की पूर्ति वास्तव में प्राप्त होती है। सैद्धांतिक स्वतंत्रता और भौतिक बंधन से वास्तविक स्वतंत्रता में अंतर की एक खाई है। भागवतम (10.14.4) कहता है कि यदि कोई भक्ति सेवा के शुभ मार्ग को छोड़ देता है और केवल अटकलों से चीजों को जानने की कोशिश करता है, तो वह अपने मूल्यवान समय को बर्बाद कर देता है (क्लिश्यंती ये केवल-बोध-लब्धये)। प्रेम के ऐसे श्रम का परिणाम केवल श्रम है; कोई अन्य परिणाम नहीं है। अटकल का श्रम केवल थकावट से समाप्त होता है। उदाहरण दिया जाता है कि खाली धान की भूसी को छीलने में कोई लाभ नहीं है; चावल पहले ही चला गया है। इसी तरह, केवल सैद्धांतिक प्रक्रिया से कोई भी भौतिक बंधन से मुक्त नहीं हो सकता, क्योंकि कारण अभी भी मौजूद है। किसी को कारण को शून्य करना होता है, और फिर प्रभाव को शून्य कर दिया जाएगा। यह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा निम्नलिखित छंदों में समझाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)