श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.27.2 
स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते ।
अहंक्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
जब आत्मा प्रकृति और अहंकार के मोहपाश में बँध जाती है, और शरीर को आत्मा समझने लगती है, तब वह केवल भौतिक कार्यों में ही उलझकर रह जाती है और अहंकार के कारण सोचती है कि वही हर चीज पर नियंत्रण रखती है।
 
When the soul falls under the influence of the magic of nature and ego and takes the body to be the self (soul), it gets involved in material activities and egotically thinks that it is the doer of everything.
तात्पर्य
वास्तव में सशर्त आत्मा भौतिक प्रकृति के साँचे के दबाव में कार्य करने के लिए बाध्य है। जीवित इकाई की कोई स्वतंत्रता नहीं है। जब वह भगवान के व्यक्तित्व के निर्देशन में होता है तो वह स्वतंत्र होता है, लेकिन जब यह सोचकर कि वह अपनी इंद्रियों को संतुष्ट कर रहा है, वह इंद्रियों को संतुष्ट करने वाली गतिविधियों में संलग्न होता है, तो वह वास्तव में भौतिक प्रकृति के जादू के अधीन होता है। भगवद-गीता में कहा गया है, : व्यक्ति उन विशिष्ट प्रकृति के साँचे के अनुसार काम करता है जो उसने प्राप्त कर लिए हैं। गुण प्रकृति के गुणों को संदर्भित करता है। वह प्रकृति के गुणों के अधीन है, लेकिन वह झूठा सोचता है कि वह स्वामी है। स्वामित्व की इस झूठी भावना को केवल भगवान या उनके वास्तविक प्रतिनिधि के निर्देशन में भक्ति सेवा में संलग्न होकर ही टाला जा सकता है। भगवद-गीता में, अर्जुन लड़ाई में अपने दादा और गुरु को मारने की जिम्मेदारी खुद स्वीकार करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह उस कार्य के स्वामित्व से मुक्त हो गया जब वह कृष्ण के निर्देशन में कार्य किया। वह लड़ा, लेकिन वह वास्तव में लड़ने की प्रतिक्रियाओं से मुक्त था, हालांकि शुरुआत में, जब वह अहिंसक था, लड़ने को तैयार नहीं था, तो पूरी जिम्मेदारी उसी पर थी। मुक्ति और कंडीशनिंग के बीच यही अंतर है। एक सशर्त आत्मा बहुत अच्छी हो सकती है और अच्छाई के तरीके से कार्य कर सकती है, लेकिन फिर भी वह भौतिक प्रकृति के जादू के अधीन है। हालाँकि, एक भक्त पूरी तरह से भगवान के निर्देशन में कार्य करता है। इस प्रकार उसके कार्य आम आदमी को बहुत उच्च गुणवत्ता के नहीं लग सकते हैं, लेकिन भक्त की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)