श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.27.19 
अकर्तु: कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रय: ।
गुणेषु सत्सु प्रकृते: कैवल्यं तेष्वत: कथम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
सर्व कर्मों का कर्ता न होते हुए भी, जब तक भौतिक प्रकृति उस पर अपना प्रभाव डालती रहती है और उसे बाँधे रखती है, तब तक आत्मा की मुक्ति कैसे संभव है?
 
Therefore, even if a living being is not the doer of all actions, how can it be independent as long as nature continues to influence it and keep it bound?
तात्पर्य
हालाँकि जीव पदार्थों के संदूषण से मुक्ति का इच्छुक होता है, उसे विमुक्ति नहीं दिया जाता है। वास्तव में, जैसे ही कोई जीव स्वयं को भौतिक प्रकृति के तरीकों के नियंत्रण में रखता है, उसके कार्य भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित होते हैं, और वह निष्क्रिय हो जाता है। भगवद-गीता में इस बात की पुष्टि की गई है कि प्रकृति के क्रियामाणानी गुणैः : जीव भौतिक प्रकृति के गुणों या तरीकों के अनुसार कार्य करता है। वह झूठे तौर पर सोचता है कि वह अभिनय कर रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से वह निष्क्रिय है। दूसरे शब्दों में, उसके पास भौतिक प्रकृति के नियंत्रण से बाहर निकलने का कोई अवसर नहीं है क्योंकि इसने पहले ही उसे वातानुकूलित कर दिया है। भगवद-गीता में यह भी कहा गया है कि भौतिक प्रकृति के चंगुल से निकलना बहुत कठिन है। कोई यह सोचने के लिए विभिन्न तरीकों से कोशिश कर सकता है कि अंततः सब कुछ शून्य है, कि कोई भगवान नहीं है और यह भी कि अगर हर चीज की पृष्ठभूमि आत्मा है, तो यह अवैयक्तिक है। यह अटकल चलती रह सकती है, लेकिन वास्तव में भौतिक प्रकृति के चंगुल से निकलना बहुत कठिन है। देवहूति यह प्रश्न उठाती है कि यद्यपि कोई भी कई तरह से अटकलें लगा सकता है, जब तक कोई भौतिक प्रकृति के जादू के अधीन है, मुक्ति कहाँ है? उत्तर भगवद-गीता (7.14) में भी पाया जाता है: केवल वही व्यक्ति जो परम भगवान कृष्ण (माम एव ये प्रपद्यंत) के चरण कमलों में आत्मसमर्पण कर चुका है, माया के चंगुल से मुक्त हो सकता है। चूंकि देवहूति धीरे-धीरे आत्मसमर्पण के बिंदु पर आ रही है, इसलिए उसके प्रश्न बहुत बुद्धिमान हैं। कैसे कोई मुक्त हो सकता है? जब तक कोई भौतिक प्रकृति के तरीकों से मजबूती से जुड़ा रहता है, तब तक वह आध्यात्मिक अस्तित्व की शुद्ध स्थिति में कैसे हो सकता है? यह एक गलत ध्यानकर्ता के लिए भी एक संकेत है। कई तथाकथित ध्यानकर्ता हैं जो सोचते हैं, "मैं परम आत्मा हूं। मैं प्रकृति की गतिविधियों का संचालन कर रहा हूँ। मेरे निर्देशन में सूर्य चल रहा है और चंद्रमा उग रहा है।" वे सोचते हैं कि इस तरह के चिंतन या ध्यान से वे मुक्त हो सकते हैं, लेकिन यह देखा गया है कि इस तरह के बकवास ध्यान को समाप्त करने के ठीक तीन मिनट बाद, वे तुरंत भौतिक प्रकृति के तरीकों द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। अपने उच्च-ध्वनि वाले ध्यान के तुरंत बाद, एक "ध्यानकर्ता" प्यासा हो जाता है और धूम्रपान या शराब पीना चाहता है। वह भौतिक प्रकृति की मजबूत पकड़ में है, फिर भी वह सोचता है कि वह पहले से ही माया के चंगुल से मुक्त है। देवहूति का यह प्रश्न ऐसे व्यक्ति के लिए है जो झूठे तौर पर दावा करता है कि वह सब कुछ है, कि अंततः सब कुछ शून्य है, और कि कोई पापपूर्ण या पवित्र गतिविधियाँ नहीं हैं। ये सभी नास्तिक आविष्कार हैं। वास्तव में, जब तक कोई जीव भगवद-गीता में दिए अनुसार भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के सामने आत्मसमर्पण नहीं करता, माया के चंगुल से कोई मुक्ति या स्वतंत्रता नहीं होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)