यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकत: ।
अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धे: परस्य च ॥ १८ ॥
अनुवाद
जिस तरह पृथ्वी और उसकी सुगंध अथवा जल और उसके स्वाद का कोई अलग-अलग अस्तित्व नहीं है, उसी तरह बुद्धि और चेतना का भी कोई अलग-अलग अस्तित्व नहीं हो सकता।
Just as the earth and its smell or water and its taste cannot have a separate existence, similarly intelligence and consciousness cannot have a separate existence.
तात्पर्य
यहाँ مثال दिया गया है कि किसी भी भौतिक वस्तु में सुगंध होती है। फूल, धरती - हर चीज़ - में सुगंध होती है। अगर सुगंध को भौतिक वस्तु से अलग किया जाता है, तो भौतिक वस्तु की पहचान नहीं हो सकती। अगर पानी में स्वाद नहीं है, तो पानी का कोई मतलब नहीं है; अगर आग में गर्मी नहीं है, तो आग का कोई मतलब नहीं है। इसी तरह, जब बुद्धि का अभाव होता है, तो आत्मा का कोई अर्थ नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥